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बड़े आये भगवान के लगे|

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तुम जितना भगवान-भगवान में लगे हो। पहले ये बताओ आखिर खुद के कितने सगे हो? ये  भी बताओ भगवान को जानते   कितना  हो? कभी मिले   हो उससे? तुम उसे मानते जितना हो। ये मत कहना कि फलां मंदिर में मिला हूं। चरणों में भगवन के पुष्पकमल सा खिला हूं। क्योंकि मंदिर में तुम जिससे मिले हो तुमने  उसके   , हाल चाल तक नहीं पूछे। गये थे दुखड़ा रोने अपना, चार लोगों से गुटरगूं करके आ गये। तो मानके अब यूं चलो कि तुम अपने भगवान पे जितने भी पिले हो उसे हिसाबे से अब तक बस घंटे के मिले हो। तुम जितना उसकी चापलूसी में लगे हो। ये तो बताओ क्या खुद के भी इतने सगे हो? कभी देखा है भगवान को आखिर कि दिखता कैसा है? ये मत कहने लगना कि कुम्हार की दुकान पर, बिकता जैसा है। ये तो सुनना ही नहीं कि टीवी पर महाभारत में देखा है। क्योंकि देखा तो बच्चों ने, आईरन मैन को आईमैक्स थ्रीडी में भी है। क्या कहोगे कि भगवान का साक्षात्कार रामायण पढ़कर किया है? इससे भली तो कॉमिक्स है जिसमें नाग...

शुक्रगुज़ार

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तुम्हें वक्त का ठहराव भी ठीक लगे और हो पसंद उसमें तुम्हें बदलाव, पर जो हो पसंदीदा उसमें सुलझा सा दांव । क्योंकि इतना शुक्रिया होना अभी है कम। तुम्हें स्वर्गीय सुख भी पसंद हो और नरक की भीड़ भी ठीक ठाक लगे, पर हो पसंदीदा उनमें कुदरत सा फैलाव । क्योंकि... तुम्हें इस्लामी अर्ज़ भी पसंद हो और हो पसंद सनातनी नमस्कार , पर जो हो पसंदीदा हो वो हिंदुस्तानी बर्ताव । क्योंकि... तुम्हें नगर की धूल भी ठीक लगे और पसंद आए नन्हें-नन्हें गांव भी, पर पसंदीदा हो उनमें इंसानी बदलाव । क्योंकि... तुम्हें राजनैतिक त्यौरियां भी पसंद हो और ठीक लगे फिल्मी टकराव , पर जो हो पसंदीदा हो वो नागरिकता का भाव । क्योंकि... तुम्हें बिसरे की याद भी सताए और भविष्य की उम्मीद भी पसंद हो, पर जो हो पसंदीदा हो नया सालाना ताव । क्योंकि इतना शुक्रिया होना अभी कम है। नववर्ष की शुभकामनाओं सहित। -©अंकुश कुमार

चिल्ल पौं की दुनिया

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मैंने अपनी आंखें हैं बंद कर लीं। और मैं हूं एक ऐसी दुनिया में। जिसे मैं चिल्ल पौं की दुनिया हूं कहता। यह दुनिया है वैसे बड़े रुखसत अंदाज में बनी। दुनिया में इस, शोर के अलावा होता है कुछ भी नहीं । हर आती-जाती आवाज होती है जानी पहचानी। लेकिन फिर भी किसी के लिए ठहरता कुछ भी नहीं। क्योंकि यह है एक ऐसी दुनिया... जिसे मैं चिल्ल पौं की दुनिया हूं कहता। मान लीजिए कहीं कभी किसी के लिए गलती से। या बिना गलती हुए कुछ थम जाए। तो समझ लेना आखिर में, यह कुछ नहीं थमा, बल्कि दुनिया थम जाए। क्योंकि यह दुनिया ही है ऐसी दुनिया... जिसे मैं चिल्ल पौं की दुनिया हूं कहता पर यह जो वक्त का कांटा है अभी अभी रूका। मुझे तो कुछ खास नहीं पर दुनिया को जरूर चुभा। क्योंकि वक्त पीछे जब नहीं है मुड़ सकता। फिर उसका शोर ही क्यों रुका भला। सुनलो अब यही है अजब गजब की दुनिया... जिसे मैं चिल्ल पौं की दुनिया हूं कहता।

दादाजी और धूप

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उम्र के इस पड़ाव पे, वक्त के इस घुमाव पे, दादाजी को धूप पसंद ठहरी| सवेरे अंधेरे उन्हें बिस्तर से निकलने में डर बहुत लगता है| लेकिन जाते ही ज़रा सी आंखों में, धूप नाम की चिंगारी, उठते हैं ऐसे, मानो स्वयं साक्षात अर्जुन से, कभी ना सोने की शिक्षा लेकर आये हैं, पर जगते ही निकल पड़ते हैं, दूर तलक, हाथ में बेंत और आँखों में धूप की उम्मीद लिये, जहाँ तलक हैं चल सकते, कदम ठिठकते-ठिठकते, मानो वो धूप नहीं ढूंढ रहे, ढूंढते हैं ज़िन्दगी को उम्र के इस पड़ाव पे, क्योंकि वक्त के इस घुमाव पे, पसंद दादाजी को धूप बहुत ठहरी|  पड़ते ही माथे पे किरण पहली,  गूंज उठे है किलकारी, जिसमें कोई  बूढ़ा नहीं, बच्चा है बैठा होता, ला मेरी कुर्सी दे,  ला मेरा अखबार दे, जब नहीं है पहुंचा पाता कोई,  तो आती हैं गूंजती हुई, आवाज़ें खरड़-खरड़, शायद हमारे घर में धूप,  बचपना लेकर आती है, दिन भर धूप में सुस्ताते हैं,  कभी हैं धीर गंभीर हो अखबार पढ़ते, कभी खाना धूप में ही मंगवाते हैं, लोग कहते है...

गुटर गूं

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किसने कहा मुझे गुटर गूं अच्छी है लगती। नहीं, ना मुझे गुटर गूं अच्छी है लगती! ना ही कबूतरों कि गर्दन में धंसे, वो चमकीले से पंख, जिसे दिखा दिखा के लोगों को बेवकूफ़ और कबूतर को ख़ूबसूरत बताया बनाया जाता है। ना ही कपोत को हवा में लहराया फहराया जाना बनाके जैसे कि मिसाल में हो शांति का दूत । क्यूंकि, जैसे ही, नज़र जाती है तरफ इनके नज़र आता है मुझे, अचानचक से! गौरैयाओं का बहुत दूर चले जाना और फिर मुड़के कभी वापिस ना आना समझदार लोग इसे गौरैया के लिए विनाश कागारी भी हैं बताते। लेकिन सच ये है... कि कबूतरों में मैंने अपना बचपन ख़त्म होते देखा है। © अंकुश कुमार

उम्मीद भी क्या ज़बरदस्त चीज़ है!

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जब कोई कर बैठता है उम्मीद, तब कुछ ज़्यादा ही आती है शरम, कभी उम्मीदों से कोई रूबरू होकर, कहीं कभी गलती से फोन पर। और शरम ऐसे नहीं आती, की मैं बस शरमा गया... ये आती है मानो कि सारे भरे बाज़ार, पड़े हों लठ्ठ कमर पर। क्योंकि सब इस उम्मीद को किसी का पुरजोर हमला मानो कैसे हो सकता है इस उम्मीद का डटकर सामना बस सोचते रह जाओ और सबसे ज़्यादा आती है तब जब मुझसे बड़े मुझे खुदसे बड़ा समझने लगते हैं। और कर बैठते हैं, बड़ी ही उम्मीदों से उम्मीद। तब ही बदलती है शरम खीझ में, जब आने आने लगता है अनोखा विचार कि तुम क्या क्या हो सकते थे, और क्या क्या कर सकते हो? फिर मिटाने को झेंप अपनी थमा देता हूं उन्हें कॉन्टेक्ट किसी का, जिसे मैं सीधे और व्यक्त शब्दों में कंसंर्न्ड पर्सन परिभाषित हूं करता। मैं जानता हूं जो ये मेरे गिने चुने दोस्त हैं, सब संभाल लेंगे, और अगर नहीं संभाल पाएंगे, तो उनका भी कोई कंसंर्न्ड पर्सन होगा ही। और इस तरह उम्मीदों की रखवाली के लिए बनती जाती है, कंसंर्न्ड लोगों की भौगोलिक और कभी ना खत्म होने वाली लड़ी, जिनमें खुद से उलझे लोग भी, कुछ देर के लिए सही ...

जज़्बात

नज़ीर पूछे जज़्बातों से बोलो तुम क्या कहते हो, जज़्बातों की वकील बानी ज़िबां, बोली ये कहाँ कुछ कहते हैं? ये तो बस ज़िंदा रहते हैं| इन्हें मरना आया ही नहीं, समय के साथ भीष्म मरे, बुद्ध मरे, मरे अनेक शरीर, राम मरे, कृष्ण मरे, रहे जज़्बात अधीर| ये तब भी थे, ये आज भी हैं, ये कल-परसों पे सवार और आगे भी रहेंगे, ये धृतराष्ट्र-गांधारी में भी थे, सुभद्रा-अर्जुन में भी, ये हैं बुद्ध-यशोधरा में भी, रह रहे लव कुश में भी| ये जगह नहीं बदला करते, बदलती हैं तो बस तारीखें, लोग, अंदाज़, हिसाब-किताब, और ये बस मजबूरियां| ये ज़िंदा रहते हैं, ये कुछ नहीं कहते बस देखते रहते हैं| हाँ पर इन्हें  चाहिए हूँ मैं, मेरे दोस्त, ज़ाहिर करने को अलफ़ाज़, हाव-भाव से, गुस्सा-मुहब्बत-अफ़सोस| हम चले जाते हैं, समय के साथ, ये ज़िंदा रहते हैं, ये कहाँ कुछ कहते हैं, ये तो बस ज़िंदा रहते हैं| - © अंकुश कुमार 

परमानेंट

कभी चिपकाई थी बिंदी शीशे पे ड्रेसिंग टेबल के| हालात बने ऐसे रहे कि परमानेंट हो गई|  चलते रहे, आहें आती रहीं, इस एक्सीडेंटल प्यार में| मीठी सी गलती यहाँ पूरा वारंट हो गई| पहले कशिश फिर कोशिश बाद बेबाक शरारतें| धीमे से ख़ुशबुऐं यहाँ कोलोन से सेंट हो गईं| उफ़ ये मुस्कुराहटें फिर तरेरना कभी ओंठ काटने| धीमे-धीमे कॉलें यहाँ वेडिंग टेंट हो गईं| कुछ मुलाकातें थोड़े ख़्याल चंद ख़्वाब कैसे रहे| अर्थिंग से ज़िन्दगी आखिर मस्त करंट हो गई| कोई पूछेगा तो आखिर में आप कहोगे क्या? मुस्कुरायेंगे, समझ जाना, यादें परमानेंट हो गईं | - © अंकुश कुमार, इट्स लार्जर देन लाइफ, ग़ज़ल नहीं रे, मुहब्बत!

अचम्भा

आज एक अचम्भा देखा| वक्त जैसे थमा सा देखा| जितना देखा उतना परखा| चोरों को भी अखरा देखा| बात पुरानी बीत गयी जब| नींद सयानी रूठ गयी तब| जितना जब भी मैंने परखा | अजब गज़ब सा चरखा देखा| आज एक अचम्भा... बीत चुका है सोमवार अब| बार वार की बारी है सब| परखो तुम भी ऐसा परखा| कहना क्या-क्या वखरा देखा| आज एक अचम्भा...

कठघरा

मंदिर किन्हीं ख़ास अभिजात्य वर्ग के लिए तब भी ऐशगाह थे, आज भी हैं और हमेशा रहेंगे और रहेंगे, रहेंगे तब तलक! जब तलक किसी किसी भी मूर्त्ति को वहाँ से जाता नहीं निकाला, किया जाता कठघरे में खड़ा और जाता पूछा, बताओ हर ऐश के हिस्से में तुम्हारा क्या किस्सा है, और इस किस्से के कितने हिस्से में झूमा कौन सा फलक? पर कठघरे में खड़ा किया जाना ज़्यादा  ज़रूरी है|

शुतुरमुर्ग का अंडा

तुम्हारी आँखें जैसे  शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर आँसू ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा तुम्हारा ललाट जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर भी दिमाग ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा तुम्हारा ख्याल जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर फिर सवाल ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... तुम्हारा नक्श जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसीपर हावभाव ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... तुम्हारी खिलखिलाहट जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर मेरी हालत ऐसी-जैसे शुतुरमुर्ग का.... तुम्हारे कुछ ख़यालात जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा फिर मेरे सवालात ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... तुम्हारी गरिमा भी जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा और उसपर फिर इठलाना ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... तेरा आंखें दिखलाना जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा फिर मेरी हरकत बचकाना ऐसी-जैसे शुतुरमुर्ग का... तेरे-मेरे बीच की दीवार जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर मेरे ये हालात ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... मेरे कुछ अरमान जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर तेरे वादे ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... तेरा कहीं खोजाना जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा और उसपर तेरा मिल पाना ऐसे-जैसे...|

माहौल आज-कल!

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At your service majesty जंगलों में जिनके आज-अभी  अवशेष रहते हैं|  हक़ीक़त है इतने ही हौसले आखिर में शेष रहते हैं|| अख़बार या दीवार  को जो ख़ास हैं कहते|  अंदर भी उन्हींके कई-कई भेस रहते हैं|| जो हाथ-पैरों को आवाज़ से महफ़ूज़ रख लेते| झोली में उन्हीं की मुकम्मल लोग रहते हैं|| चलन है मीडिया कुछ भी फैला दो दार हो चाहे| आस्तीनों में उन्हीं की कहीं पर सांप रहते हैं || सनातनी की तनातनी  या आर्यसमाज का खाना | गुज़रना मत कभी यहाँ पर नीच रहते हैं || माहौल नफ़रत का तुम भी सहयोग दो थोड़ा| लोगों का काम है लड़ना लो हम हाथ देते हैं || भेस                      =                Compositions/Faces. महफ़ूज़                =                Preserved. मुकम्मल             =             ...

विहंगम विश्वास

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ये पथरीले-रेतीले जंगल , ये ज़िंदा सांस लेते सागर-महासागर | हाँ ये वही बासी बहती हवा पे ताज़ी गुनगुनाती धूप | सब तेरे लिए है और उन सबके लिए जो  तेरे लिए हैं | इस डिब्बे में बंद सारी मिश्री सी यादें और मिश्री पे बैठी वो काली सी चींटी जिसके पंख भी कनक से सजे हैं वो अभी  खनककर उड़ी है और बैठी है उस घड़ी  पे जो तेरे स्वेद-श्रम-सम मोतियों से सजी है| और उसकी टिकटिक से आवाज़ इतनी ऊंची कि मुड़के लोग पूछेंगे ये घड़ी-अड़ी  किसलिये है| कहना कुछ भी तुम्हारा कभी नहीं होगा काफी मेरी ज़मीं इसलिए है मेरा आसमां उसलिए है | जोड़ना पड़ेगा पंखों से पीर  को और बनना पड़ेगा खुदसा 'नज़ीर' को वरना ये विहंगम विश्वास किसलिए है? १. कनक    -       Gold २. स्वेद      -       Sweat ३. पीर        -      Agony + Faqir ४. नज़ीर    -       Perfect Example ५. विहंगम -       Huge : © "Ankush Arya", 2017 ...

औकात की बात!

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Glow worms vs Moon Light तुम्हारे-हमारे  नसीब में टिमटिमाते तारे   कहाँ हम-तुम उन ख्वाबों में हैं  जिनमें कुछ खिड़कियाँ हैं तो कुछ रोशनियाँ |  कुछ लोग ताक रहे हैं  जिसमें एक चांद जो हर रोशनी को रोशन करेगा ना यहाँ ना वहाँ अब वो हालात कहाँ | बारिश थी और होगी होती रहेगी पर रोशनी छिटकाते बादलों की रात कहाँ बरसात कहाँ| जो जहाँ था वो वहीं ठहरा होगा रास्ते हों रोशन वो अब रात कहाँ । सुना था कभी जो  चांद देहरी सोने सी रोशन करता था ना तेरी में ना मेरी में ना झोली में चांद की अब वो रात कहाँ औकात कहाँ | : © "Ankush Arya", 2017

अजगर बैठे हैं!

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Name shouldn't be enough. यहाँ बस खामखां बुतों से लिपटे हैं लोग| बाकी दुनिया में  कोई धंधा परेशानी नहीं है||  कभी इंशाअल्लाह तो कभी भगवान भला करेगा| तमाशा है क्या बेटा! ज़िन्दगी है कोई नादानी नहीं है|| बयार पे लिपटी जमात खड़खड़ाते पत्तों सी हो गई| बुढ़ापा है! बचपना है! यहाँ बस जवानी नहीं है|| होठों और मुँह पे चिपके हैं थप्पड़ और गालियां| समाज में आदत है! फ़ख्र है! ये कोई बीमारी नहीं है|| तारीफ़ों के हैं झूठे फ़ूल और बहती हैं मतलब की नदियाँ| बाकी मेहनत की कोई यहाँ बागबानी नहीं है|| कभी कहते हैं काट देंगे गला चीर देंगे सीना पी जाएंगे खून| हाह! हँसी आती है, ये कोई गौमूत्र या जमजम का पानी नहीं है|| : © "Ankush Arya", 2017

काफ़िर के जज़्बात

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Add caption ऐसा भी कोई मसला नहीं था हुज़ूर | इंज़ील  जो  हिचकियों में मसल डाला||  दोज़ख से भी ना घबराये जानिब कभी|  जो हुकुम ने दिया  तरेर और डरा डाला||  क्या कज़ा क्या शिकन लाये माथे पर|  जो तारीफ़-ए-बयार  की अदा ने फना डाला|| मुद्दतों के सपने और ज़िंदादिली ये ज़िंदा | तिरि तहरीकों ने काफिर-ज़िंदा-बुत बना डाला|| कभी घुटनों पे टिके तो कहीं वुज़ू में हैं झुके | साज़िश है ! कहाँ  नमाज़ी थे  कहाँ काफ़िर  बना डाला|| अब इन जुलूसों में कहाँ टिक पायेंगे  बुतपरस्त | ' नज़ीर ' इन नज़रों ने कभी बना डाला कभी  मिटा डाला || 1. इंज़ील                        =                              Grim The Reaper 2.  दोज़ख                         =            ...

फ़र्क पड़ेगा क्या?

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तुम हँस पड़े हो जो, अपने दायरों और दायित्वों से बाहर आके। बदलना-निगलना चाह रहे हो, अपने खाके और खाके पर खाके। ये जो गर्मजोशी तुमने तमाम नज़र, ज़मीन और बदन पर लिपटाई हुई है। आज वो इस कदर तुमसे चिपकी है, मानो वो 'की' नहीं है, 'काई' हुई है। ये सफर नम्र-विनम्र दास्तानों से शुरु होकर ख़त्म अब ख़त्म होने पर ही होगा। जिस भी क़िताब से पन्ना फटा था या फाड़ा, उस आधार पर नया अध्याय होगा। आरज़ू और जुस्तजू के जंगलों को इकतरफा​ ज़िक्र में भी बर्फ देना अब। ओरों-पोरों के जलों को तारीफ-ए-शबनम पर भी नमी की ज़मीं देना अब। किस्से-कहानियों की नुमाइश में कुचलों-पिछड़ों​ के सबको जगह मिलेगी। तुम जन्म कुंडली बांचो या बांटो भविष्य के पर्चे, ख़बर ज़रूर मिलेगी तुमको ख़बर ज़रूर मिलेगी। : © "Ankush Arya", 2017

बयार पर बूंदें

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अब्र का गुस्सा हो या हो सब्र की फ़िक्र तुम| लाख दुआओं की दया या मौसम कुछ बेसब्र तुम|| सरसराहट-गड़गड़ाहट में लिपटी सी हो आंधियां| दड़दड़ाहट-छमछमाहट में हो लिपटी तुम तालियां|| लाख पहाड़ ढालों से बनी सूरज की हो कब्र तुम| या जीवन की आशा-अभिलाषा, पावन-निर्मल द्रव्य तुम|| हवा में लिपटी, लू में छितरी हो गर्मी को पड़ने वाली गालियाँ| जवां उम्र का निश्छल प्रेम, या हो कुफ़्र बयां कुछ हालिया|| जो भी हो झमझम बरसो, हो बाल-सुलभ लावारिस तुम| जो भी  हो रिमझिम कर दो मन, हो पहली-पहली बारिश तुम|| अब्र                                 =                              Cloud निश्छल                           =                              U...

जो भी समझो!

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ऐसा मैं क्या लिख दूँ अब! इक सम्यक सा झूठ लिखूँ या कहूँ तिलमिलाया सच, अपनी तीखी जुबां घोल दूँ या पीलूँ मैं अब आहें सब, तेरी तारीफों पे तारीफें कर दूँ या करुँ मन खुरदुरा अब, तेरा सवाल मेरा जवाब या मेरे सवाल तेरे जवाब, तरन्नुम पे हालात लिख दूँ या ज़हर भरे से कड़वे शब्द, बेगानी बातें सब लिख दूँ या लिख दूँ दिल की हालत अब! मेरा कहा अपना अनकहा जो भी तूने झेला होगा! तेरा भी कुछ बयान होगा जो कुछ तूने ठेला होगा! मैंने तुझसे तूने मुझसे जो कुछ थोड़ा खेला होगा! ख़ास खराबी होंगी मुझमें पर थोड़ी-थोड़ी सबमें  होंगी, कहना जो कुछ होगी शिकवा जिनसे भी मन दहला होगा! तेरी आँखें  पत्थर हो जब नाम कुरेदना मेरा तब| नहीं मिटेगा अमिट रहेगा मेहंदी-रोली टीका रब| हाथ सभी हों जब गज-बज घर-भर को सजाना तब| अमर रहेंगे अजर कहेंगे शीशा-तुलसी दर पे सब| ऐसा मैं क्या लिख दूँ  अब! सम्यक                       =                        ...

ओह! तो तुम हो ठोकर|

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चश्मदीदों ने कहा आँखो ही आँखों में नक़ल आती है| बादाम नहीं ठोकर नहीं अब ठोकरों से यहाँ अकल आती है|| कहीं किसी का चित-चोर है कहीं किसी का मन-मोर|  पके बालों में ही अक्सर ज़िन्दगी की फसल आती है|| सलोना-सलोनी, गुड्डा-गुड़िया यहाँ खेल सब जानते हैं| राजनीति-साजनीति में यहाँ हर घर की शकल आती है|| तारीफों के चुनिंदा पुलिंदों ने मुहों को बांधा है आजकल|  वरना तेज़ाब की बारिश कहाँ अब असर लाती है|| खाली की बातें हैं वी. आई. पी. कल्चर ख़त्म करने की| अभी तो हासिल में ही सबकी दुर-दूर नज़र जाती है|| चाहे नेता या पुलिस या हो चोर नहीं फिर अफ्स्पा| सबकी यारी-बेकारी देश में बस कलह लाती हैं|| : © "Ankush Arya", 2017