माहौल आज-कल!
हक़ीक़त है इतने ही हौसले आखिर में शेष रहते हैं||
अख़बार या दीवार को जो ख़ास हैं कहते|
अंदर भी उन्हींके कई-कई भेस रहते हैं||
जो हाथ-पैरों को आवाज़ से महफ़ूज़ रख लेते|
झोली में उन्हीं की मुकम्मल लोग रहते हैं||
चलन है मीडिया कुछ भी फैला दो दार हो चाहे|
आस्तीनों में उन्हीं की कहीं पर सांप रहते हैं||
सनातनी की तनातनी या आर्यसमाज का खाना|
गुज़रना मत कभी यहाँ पर नीच रहते हैं||
माहौल नफ़रत का तुम भी सहयोग दो थोड़ा|
लोगों का काम है लड़ना लो हम हाथ देते हैं||
भेस = Compositions/Faces.
महफ़ूज़ = Preserved.
मुकम्मल = Perfect.
दार = Hanging/Death.
:© "Ankush Arya", 2017

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