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Showing posts from July 16, 2017

माहौल आज-कल!

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At your service majesty जंगलों में जिनके आज-अभी  अवशेष रहते हैं|  हक़ीक़त है इतने ही हौसले आखिर में शेष रहते हैं|| अख़बार या दीवार  को जो ख़ास हैं कहते|  अंदर भी उन्हींके कई-कई भेस रहते हैं|| जो हाथ-पैरों को आवाज़ से महफ़ूज़ रख लेते| झोली में उन्हीं की मुकम्मल लोग रहते हैं|| चलन है मीडिया कुछ भी फैला दो दार हो चाहे| आस्तीनों में उन्हीं की कहीं पर सांप रहते हैं || सनातनी की तनातनी  या आर्यसमाज का खाना | गुज़रना मत कभी यहाँ पर नीच रहते हैं || माहौल नफ़रत का तुम भी सहयोग दो थोड़ा| लोगों का काम है लड़ना लो हम हाथ देते हैं || भेस                      =                Compositions/Faces. महफ़ूज़                =                Preserved. मुकम्मल             =             ...