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Showing posts from February 12, 2017

क्षुधा से क्षुब्ध

आहार की तलाश वा शिकार भात मनुष्य अथवा सभी जानवरों के लिये, क्या सामुदयिकता का समारोह है? या यह वह प्रसाद है, जिसे वह सप्रेम अधिकार ग्रहण करता है। यापन रूपी जीवन के लिये,             वा जीवन स्थित यापन के लिये? निश्चय ही सप्रेम संधि है             जिसमें आवरण उच्छेद भी उतना आवश्यक है जितना             परिच्छेद कथा के लिये। मानव ऐन्द्रिय रूप से सामुदायिक है, या इन्द्रियों के लिये सामुदायिक है? ये अनिवार्य क्षुब्ध प्रश्न है क्षुधा से! आहार के लिये विचार के  लिये। : © "Ankush Arya", 2017

अक्सर हादसे ही हुआ करते

दु:ख देने वालों की आँखों से,             आँसू नहीं चुआ करते। राजनीति में क्यूँकि अक्सर,             हादसे नहीं हुआ करते॥ जो छिटपुट-छिटपुट बातों में,             बातों के तीर चलाते हैं। उनके ही दामन में अक्सर,             घनघोर घाव हुआ करते॥ राजनीति में क्यूँकि अक्सर... मेहनतकश परिवार को जो,             जातिगत बतलाते हैं। विद्या के अधिकार को जो,             नीच बोल धकियाते हैं। उनके ही घुटनों पर अक्सर,             ज़ालिम दर्द हुआ करते॥ राजनीति में क्यूँकि अक्सर... वारदात करने पर जो,        ...

कड़वा लगा ना!

देख रही हूँ बहुत देर से  हद  गंदे से घूरते ही हुए,  कुछ परेशान हो? अरे दोस्ती के पीछे ही पड़े हो बिना जान-पहचान के,  समझो, अंजान हो! तुम तो पीछा कर-करके गली तक भी आ गये,  कहो श्वान् हो? इंसानियत की खातिर वर्चुअली पीछा छोड़ो,  मर्ज़ इंसान हो! कैसे हुई हिम्मत जो अचानक हाथ लगाने लगे,  नालायक! हैवान! हो।। अरे कैसे घूम रहे हो गोल-गोल पिट-पिटकर,  अरे! खेतान हो? साहब मिलने आईं हैं कोई बच्चियां आपसे,  कोई पहचान हो? काफ़ी मशहूर लग रहे हैं आप कारागार में,  लगता है शान हो? : © "Ankush Arya", 2017

ज़िद है क्या

जब शम्मां परवाने को बेक़रार हो जाये। जब हुक्काम तलबगार-ए-हुजूम हो जायें। तब दीठों से अपने धुँग़र्द फ़ाँक लेना। पंजो से अपने कानों को ढाँप लेना॥ जो आयें स्यार गली में तो बाँधकर, कभी ज़िबा तो कभी हाथ काट लेना॥ जब हुक्काम तलबगार-ए-हुजूम हो जायें... जो अश्क़ गर गुड़ लगने लगेंगे। चींटे मुंतज़िम मौत के होने लगेंगे॥ हो सके अगर आँखों को कील देना, वरना मुंतकिल होने में ज़माने लगेंगे॥ जब शम्मां परवाने को बेक़रार हो जाये... सर्राफ़ हो क्या जो क़ीमत बता दोगे? एहतियातन रसोई में गहने छुपा लोगे? दस्ताने ध्यान रखना, कंगन हों पहने, वरना बताओ कैसे नये पंजे बना लोगे? जब शम्मां परवाने को बेक़रार हो जाये... जब हुक्काम तलबगार-ए-हुजूम हो जायें... : © "Ankush Arya", 2017

हो जाने दो

आग को माकूल तपन पर छोड़ दो। इश्क-ए-अर्ज़ चुभन पे मोड़ दो।। तबियत भी खुश्क़ होगी तो क्या होगा, पैमाना दर्ज़ करेगा पोथी तो भी क्या होगा, हासिल ना हासिल से बढ़िया क्या होगा, जो काफ़िर को हुस्न से जोड़ दो। इश्क-ए-अर्ज़ चुभन पे मोड़ दो... इश्क के किवाड़ों पे खुदाई पली-बढ़ी मौसिक़ी इश्क से लाख बेहतर भली तंज़ हों पर चाहिये कर्ज़ ज़िंदादिली जो दो जार तार गर जोड़  दो। आग को माकूल तपन पर छोड़ दो... तमाखू की गढ़ में धँसी हथेलियाँ, काबिल-ए-तारीफ़ पहेलियाँ अठखेलियाँ, नाम जोड़ने वाले सारे सखा-सहेलियाँ, जो सासों में ईमान ओढ़ लो। आग को माकूल तपन पर छोड़ दो... इश्क-ए-अर्ज़ चुभन पे मोड़ दो... : © "Ankush Arya", 2017

नाक बीच में है

लोग ही कहते हैं अक्सर,             सेहत बहुत ज़रूरी है। हाथों में पड़ते छालों की,             मेहनत बहुत ज़रूरी है। ख्वाबों को जीते जाने में,             हरकत बहुत ज़रूरी है। कहाँ हैं अज़ीम नसीहत वाले,             गये कहाँ गुलकंदी वाले। नाक नापने ताज़ आँकने,             गये कहाँ घर के घरवाले? कौन खा गया सारी कतली,             कौन खा रहा राख-रोटी? आँख लग आयी हैं अबकी             सबकी नुचेंगी बोटी-बोटी। कुत्तों को ढोने वाले,             रखवाले भी ज़रूरी हैं? हाथ जोड़कर पड़ने वाले ...

फ़र्ज़ पूरा करो

वो गुब्बारे बेचता लड़का, जो इन्सान लग रहा था। आज लाल बत्ती पर, आदमखोरों के पैरों पर, गिड़गिड़ाकर लेटने लगा, आदिम गुज़ारिश करने लगा। मुनादी सी करता, बार-बार था कहता। दस का है एक गुब्बारा, ओ साहिब! ओ साहिबा! कुछ भला करदो हमारा, फ़िर भला होगा तुम्हारा! करो खूब जतन, खूब फ़ख्र करो।             असर होता न देख ज़हर घोला-बोला, इज़्ज़त करो जमाखोरी को ना कहो।             आज रात को मदद से पेट हमारा भरदो। गल-बहियाँ बैठी आदमखोरनी, हिचकिचाई तमतमाई । ...खोर भी खिसियाया , और फ़िर तमतमाया । फ़िर झेंपते हुए उसने, ना को गर्दन से हाँ दिखाया! बच्चा समझदार था, या बहुत समझदार था,             इधर- उधर के इशारों में सब समझ गया। बात ना यहाँ की हुई ना वहाँ की, मान लो ना किसी ने कुछ कभी कही, ना ही किसी ने कानोंकान कुछ सुनी। खामोशी पसर चुकी थी माहौल में,          ...