फ़र्क पड़ेगा क्या?
तुम हँस पड़े हो जो, अपने दायरों और दायित्वों से बाहर आके।
बदलना-निगलना चाह रहे हो, अपने खाके और खाके पर खाके।
ये जो गर्मजोशी तुमने तमाम नज़र, ज़मीन और बदन पर लिपटाई हुई है।
आज वो इस कदर तुमसे चिपकी है, मानो वो 'की' नहीं है, 'काई' हुई है।
ये सफर नम्र-विनम्र दास्तानों से शुरु होकर ख़त्म अब ख़त्म होने पर ही होगा।
जिस भी क़िताब से पन्ना फटा था या फाड़ा, उस आधार पर नया अध्याय होगा।
आरज़ू और जुस्तजू के जंगलों को इकतरफा ज़िक्र में भी बर्फ देना अब।
ओरों-पोरों के जलों को तारीफ-ए-शबनम पर भी नमी की ज़मीं देना अब।
किस्से-कहानियों की नुमाइश में कुचलों-पिछड़ों के सबको जगह मिलेगी।
तुम जन्म कुंडली बांचो या बांटो भविष्य के पर्चे, ख़बर ज़रूर मिलेगी तुमको ख़बर ज़रूर मिलेगी।
:© "Ankush Arya", 2017

Comments
Post a Comment