बस इक याद ही तो है
उन बंद गुम कमरों को बताना उनकी नींव पक्की थी, उन ताकतवर दरवाज़ों से कहना उनकी तबियत अच्छी थी, उस डगमगायी ड्योढ़ी को छेड़ना उनकी नीयत तरक्की थी, उन खुरदुरी सीढ़ियों पर भी बैठकर फ़िर फूलों पे नज़र करना और उन खुश्क गुलों से कहना उनकी खुश्बू सच्ची थी| याद क्यूँ नहीं होंगे आज भी वो अभी कल ही की तो बात है, तुम हो, मैं हूँ, सब हैं, ये जो सोच-दिन हैं और यादरात हैं। वो जो नदी बहती थी याद होगी तुम्हें? ना वो कल-कल बहती थी ना ढुल-ढुल लुढ़कती| उसकी अंदाज़-ए-रवानगी ही कुछ और थी याद होगी तुम्हें? उसका भी बयान रुकता था हर साल जेठ दुपहरी में, हर सूखते गले की अठखेलियाँ तो याद होंगी तुम्हें? पर फिर उन सभी यादों के आंगन, क्यारी, नावों पर खास अपना नाम उकेरना मत भूलना; और ये याद करना तुम कितने ज़रूरी हो! : © "Ankush Arya", 2017