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Showing posts from January 29, 2017

यमप्रश्न समुपस्थित है

हे नचिकेतः! तुम भी अनभिज्ञ नहीं हो अपनी, ख्याति से थाती से। सबकी नज़रों में तुम सर्वज्ञ थे। ज्ञानार्जन को निर्लज्ज थे। इन सब के बावजूद! आज यम प्रश्न उपस्थित हुआ है। तुम क्या कहते हो नचिकेता!             तुम्हारा जीवन क्या है? क्या तुम्हें खुद से नफ़रत नहीं है? जब तुम गये यम के पास, ज्ञान पिपासु होकर। बस बैठे रहे, पिपासित होकर। तब तुमने क्या सीखा? उन तीन दिन तीन रातों में, अगर तुम इतने ही सुशील, आज्ञान्वित छात्र थे, तो बताओ क्या बीता? निश्चय ही तुम बताना नहीं चाहते हो। क्यूँकि तुम स्वयम् से डरते थे! डरते हो! जब विचारक तुम स्वयम् से घबराते हो! तो रश्मिरथि कैसे हो सकते हो? तुम्हें आत्मा नहीं राजनीति पर ध्यान देना चाहिये। अपने पिता से कहो, बस! बहुत हुआ! अब तुम्हें आराम करना चाहिये। तुम मानते हो, तुम! आज्ञास्थिर हो। धैर्यवान हो। मैं मानता हूँ! नचिकेत केनाज्वा यज्ञाग्नि, तुम बहुरूपिये हो। जो वैकासीय बातों के द्योतक ना होकर, आकाशीय बातों के द्योतक...

प्रतीत युद्ध

युद्ध विवशताओं और सम्भावनाओं की कुंजी है! सतत-निरंतर वैचारिक विदीर्णता रूपी पूंजी है! कमरबंध पे जमधर कसलो हाथों में तलवार। मातृभूमि की रक्षा खातिर हो जाने दो यलगार। युद्ध विवशताओं और सम्भावनाओं की कुंजी है! लगातार अब चलने दो, तलवारों पे तलवार। अभी जीत बहुत हैं, हार बहुत हैं पर नहीं कहीं भी सम्पूर्ण श्रांति लेकिन फ़िर भी हो जाने दो यलगारों पे यलगार। सतत-निरंतर वैचारिक विदीर्णता रूपी पूंजी है! जीत के पीछे हार के आगे, बिछी बहुत हैं लाश। संधि का भी मूल्य होता लाशें कहतीं काश! युद्ध विवशताओं और सम्भावनाओं की कुंजी है! सतत-निरंतर वैचारिक विदीर्णता रूपी पूंजी है!

नज़्म और नब्ज़

हसीन लाख सही मगर ख्वाब ही तो है, रंगीन चश्मे भी मगर रात ही तो है। तुम कपड़े बदल लोगे, तुम सपने बदल दोगे। पर बचपन का क्या, जो खैर याद ही तो है।। हर वक्त करवट जागीर को सुस्ताना ही पड़ेगा। उस दरख्त का क्या कुसूर जो शहतीर ही तो है।। अश्क-ए-दरिया को क्या आज बहे चाहे कल। वरना नमकीन पानी में क्या दर्द ही तो है।। इन चश्मों से निकलती आग को ज़रा थाम लेना। वरना दोज़ख़ भी मतलब से पाक ही तो है।। कंधों पे झुके हो कहीं हिल ना पड़ना। इस नामाकूल वजन का क्या बोझ ही तो है।। नज़्मों से मिले सुकूं तो ज़रा पंख बोना। अजी इस चाहत का क्या साख ही तो है।। हाथ मिलाना, गले मिलना और गर्मजोशी। बीमार इज़्ज़त का क्या नब्ज़ ही तो है।। दुआओं में बसेंगे लोग चाहने वालों के। अदायगी जिस्म का क्या खाक-राख ही तो है।।