यमप्रश्न समुपस्थित है
हे नचिकेतः! तुम भी अनभिज्ञ नहीं हो अपनी, ख्याति से थाती से। सबकी नज़रों में तुम सर्वज्ञ थे। ज्ञानार्जन को निर्लज्ज थे। इन सब के बावजूद! आज यम प्रश्न उपस्थित हुआ है। तुम क्या कहते हो नचिकेता! तुम्हारा जीवन क्या है? क्या तुम्हें खुद से नफ़रत नहीं है? जब तुम गये यम के पास, ज्ञान पिपासु होकर। बस बैठे रहे, पिपासित होकर। तब तुमने क्या सीखा? उन तीन दिन तीन रातों में, अगर तुम इतने ही सुशील, आज्ञान्वित छात्र थे, तो बताओ क्या बीता? निश्चय ही तुम बताना नहीं चाहते हो। क्यूँकि तुम स्वयम् से डरते थे! डरते हो! जब विचारक तुम स्वयम् से घबराते हो! तो रश्मिरथि कैसे हो सकते हो? तुम्हें आत्मा नहीं राजनीति पर ध्यान देना चाहिये। अपने पिता से कहो, बस! बहुत हुआ! अब तुम्हें आराम करना चाहिये। तुम मानते हो, तुम! आज्ञास्थिर हो। धैर्यवान हो। मैं मानता हूँ! नचिकेत केनाज्वा यज्ञाग्नि, तुम बहुरूपिये हो। जो वैकासीय बातों के द्योतक ना होकर, आकाशीय बातों के द्योतक...