शुक्रगुज़ार


तुम्हें वक्त का ठहराव भी ठीक लगे और हो पसंद उसमें तुम्हें बदलाव,
पर जो हो पसंदीदा उसमें सुलझा सा दांव
क्योंकि इतना शुक्रिया होना अभी है कम।

तुम्हें स्वर्गीय सुख भी पसंद हो और नरक की भीड़ भी ठीक ठाक लगे,
पर हो पसंदीदा उनमें कुदरत सा फैलाव
क्योंकि...

तुम्हें इस्लामी अर्ज़ भी पसंद हो और हो पसंद सनातनी नमस्कार,
पर जो हो पसंदीदा हो वो हिंदुस्तानी बर्ताव
क्योंकि...

तुम्हें नगर की धूल भी ठीक लगे और पसंद आए नन्हें-नन्हें गांव भी,
पर पसंदीदा हो उनमें इंसानी बदलाव
क्योंकि...

तुम्हें राजनैतिक त्यौरियां भी पसंद हो और ठीक लगे फिल्मी टकराव,
पर जो हो पसंदीदा हो वो नागरिकता का भाव
क्योंकि...

तुम्हें बिसरे की याद भी सताए और भविष्य की उम्मीद भी पसंद हो,
पर जो हो पसंदीदा हो नया सालाना ताव
क्योंकि इतना शुक्रिया होना अभी कम है।


नववर्ष की शुभकामनाओं सहित।
-©अंकुश कुमार

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