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उम्मीद भी क्या ज़बरदस्त चीज़ है!

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जब कोई कर बैठता है उम्मीद, तब कुछ ज़्यादा ही आती है शरम, कभी उम्मीदों से कोई रूबरू होकर, कहीं कभी गलती से फोन पर। और शरम ऐसे नहीं आती, की मैं बस शरमा गया... ये आती है मानो कि सारे भरे बाज़ार, पड़े हों लठ्ठ कमर पर। क्योंकि सब इस उम्मीद को किसी का पुरजोर हमला मानो कैसे हो सकता है इस उम्मीद का डटकर सामना बस सोचते रह जाओ और सबसे ज़्यादा आती है तब जब मुझसे बड़े मुझे खुदसे बड़ा समझने लगते हैं। और कर बैठते हैं, बड़ी ही उम्मीदों से उम्मीद। तब ही बदलती है शरम खीझ में, जब आने आने लगता है अनोखा विचार कि तुम क्या क्या हो सकते थे, और क्या क्या कर सकते हो? फिर मिटाने को झेंप अपनी थमा देता हूं उन्हें कॉन्टेक्ट किसी का, जिसे मैं सीधे और व्यक्त शब्दों में कंसंर्न्ड पर्सन परिभाषित हूं करता। मैं जानता हूं जो ये मेरे गिने चुने दोस्त हैं, सब संभाल लेंगे, और अगर नहीं संभाल पाएंगे, तो उनका भी कोई कंसंर्न्ड पर्सन होगा ही। और इस तरह उम्मीदों की रखवाली के लिए बनती जाती है, कंसंर्न्ड लोगों की भौगोलिक और कभी ना खत्म होने वाली लड़ी, जिनमें खुद से उलझे लोग भी, कुछ देर के लिए सही ...