दादाजी और धूप

उम्र के इस पड़ाव पे,
वक्त के इस घुमाव पे,
दादाजी को धूप पसंद ठहरी|

सवेरे अंधेरे उन्हें बिस्तर से निकलने में
डर बहुत लगता है|
लेकिन जाते ही ज़रा सी आंखों में,
धूप नाम की चिंगारी, उठते हैं ऐसे,
मानो स्वयं साक्षात अर्जुन से,
कभी ना सोने की शिक्षा लेकर आये हैं,
पर जगते ही निकल पड़ते हैं,
दूर तलक, हाथ में बेंत और
आँखों में धूप की उम्मीद लिये,
जहाँ तलक हैं चल सकते,
कदम ठिठकते-ठिठकते,
मानो वो धूप नहीं ढूंढ रहे,
ढूंढते हैं ज़िन्दगी को
उम्र के इस पड़ाव पे,
क्योंकि वक्त के इस घुमाव पे,
पसंद दादाजी को धूप बहुत ठहरी| 

पड़ते ही माथे पे किरण पहली, गूंज उठे है किलकारी,
जिसमें कोई  बूढ़ा नहीं, बच्चा है बैठा होता,
ला मेरी कुर्सी दे, ला मेरा अखबार दे,
जब नहीं है पहुंचा पाता कोई, तो आती हैं गूंजती हुई,
आवाज़ें खरड़-खरड़,
शायद हमारे घर में धूप, बचपना लेकर आती है,
दिन भर धूप में सुस्ताते हैं, कभी हैं धीर गंभीर हो अखबार पढ़ते,
कभी खाना धूप में ही मंगवाते हैं,
लोग कहते हैं  सूरज पृथ्वी के घूमने से है ढलता,
मुझे है लगता वो दादाजी की कुर्सी के इशारों पर है चलता,
जैसे ही होते हैं चार, वो सूरज और धूप  दोनों को विदा कर,
वो दूर तक जाते हैं,
ऐसा लगता है वो सूरज से, कल फिर मिलने का वादा लेकर ही आये हैं,
शायद इसीलिए दादाजी अपनी उम्र जीते हैं|
क्योंकि वक्त के इस घुमाव पे,
दादाजी को धूप बहुत पसंद ठहरी| 

© अंकुश कुमार

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