दंश का अंश
हवा में घुटी दबदबाती सी चीख को , उन तमाम दरख्तों पर उतारा। फ़िर लिखा मुझे चाहिये गालियाँ औ’ मुझे और तुम्हें बस इसी का सहारा॥ हुजूम नहीं लगा लिखने वालों का, इक्का-दुक्के आते थे, हवा में हाथ, हाथों में हवा, जादू की तरह फ़हराते थे| हवा में घुटी दबदबाती सी चीख को... सर्पंच ने अब गुप्तचर बांध लिये दुश्मन से बचने को, किसी को भी नहीं पता अब कौन-कौन है? सबका शक ही इक दूसरे पे क्यूँकि तहक़ीकात मौन है, फ़िर भी शाम को मुँह-अंधेरे की बात से चबूतरों पे, हुक्क़ों के साथ-साथ खाँसियों का हुजूम है, कुछ नई खाँसियाँ हैं, कुछ पुरानी तो कुछ मौत को आने वाली हैं, बाकी बचे तितर-बितर गुड़गुड़-खाँसी सुनने आ गये। फ़िर लिखा मुझे चाहिये गालियाँ औ’... हर हुक्के पे ढेरों फीक़ी हँसियाँ उकेरे, सभी के फीक़ेपन को है इंतज़ार। कोई समधी कुछ तो कहे कुछ तरेरे, कहाँ हैं नक्शेक...