Posts

Showing posts from March 19, 2017

दंश का अंश

हवा में घुटी दबदबाती सी चीख को ,           उन तमाम दरख्तों पर उतारा। फ़िर लिखा मुझे चाहिये गालियाँ औ’           मुझे और तुम्हें बस इसी का सहारा॥ हुजूम नहीं लगा लिखने वालों का, इक्का-दुक्के आते थे, हवा में हाथ, हाथों में हवा, जादू की तरह फ़हराते थे| हवा में घुटी दबदबाती सी चीख को... सर्पंच ने अब गुप्तचर बांध लिये दुश्मन से बचने को, किसी को भी नहीं पता अब कौन-कौन है? सबका शक ही इक दूसरे पे क्यूँकि तहक़ीकात मौन है, फ़िर भी शाम को मुँह-अंधेरे की बात से चबूतरों पे, हुक्क़ों के साथ-साथ खाँसियों का हुजूम है, कुछ नई खाँसियाँ हैं, कुछ पुरानी तो कुछ मौत को आने वाली हैं, बाकी बचे तितर-बितर गुड़गुड़-खाँसी सुनने आ गये। फ़िर लिखा मुझे चाहिये गालियाँ औ’... हर हुक्के पे ढेरों फीक़ी हँसियाँ उकेरे,           सभी के फीक़ेपन को है इंतज़ार। कोई समधी कुछ तो कहे कुछ तरेरे,           कहाँ हैं नक्शेक...

जनता का बड़ा मन था!

कुछ किया है ऐसा, मानो सपनों को आंखों में, हो धकेल दिया। कुछ जिया ऐसा, मानो बाल से नाक में, हो नकेल दिया। छींक भी आई तो फूं फूं कर दिया, आंखों से निकला पानी वापस गटक लिया। हाथों में तीर था फिर खुद चुभो लिया, पर कहे उड़ रहा था, तो हमने ले लिया। बारात में जाने को कभी मचला था हिय, तो नए कपड़ों पर हमने, ये पैबंद दे दिया। जाना है जब आगे कुछ कहना जरुर होगा, लो आसमां​ को थूका और ऊपर ले लिया। जब बगावती होगे तो नीम दंश रखना, तुम गाली कहां दोगे,जब खुखरी था रख लिया। इस कत्ल-ए-आम का कोई काश नाम होता, आवाम के जो तुमने, था ख्वाबों पे रख दिया। : © "Ankush Arya", 2017