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Showing posts from April 15, 2018

परमानेंट

कभी चिपकाई थी बिंदी शीशे पे ड्रेसिंग टेबल के| हालात बने ऐसे रहे कि परमानेंट हो गई|  चलते रहे, आहें आती रहीं, इस एक्सीडेंटल प्यार में| मीठी सी गलती यहाँ पूरा वारंट हो गई| पहले कशिश फिर कोशिश बाद बेबाक शरारतें| धीमे से ख़ुशबुऐं यहाँ कोलोन से सेंट हो गईं| उफ़ ये मुस्कुराहटें फिर तरेरना कभी ओंठ काटने| धीमे-धीमे कॉलें यहाँ वेडिंग टेंट हो गईं| कुछ मुलाकातें थोड़े ख़्याल चंद ख़्वाब कैसे रहे| अर्थिंग से ज़िन्दगी आखिर मस्त करंट हो गई| कोई पूछेगा तो आखिर में आप कहोगे क्या? मुस्कुरायेंगे, समझ जाना, यादें परमानेंट हो गईं | - © अंकुश कुमार, इट्स लार्जर देन लाइफ, ग़ज़ल नहीं रे, मुहब्बत!

अचम्भा

आज एक अचम्भा देखा| वक्त जैसे थमा सा देखा| जितना देखा उतना परखा| चोरों को भी अखरा देखा| बात पुरानी बीत गयी जब| नींद सयानी रूठ गयी तब| जितना जब भी मैंने परखा | अजब गज़ब सा चरखा देखा| आज एक अचम्भा... बीत चुका है सोमवार अब| बार वार की बारी है सब| परखो तुम भी ऐसा परखा| कहना क्या-क्या वखरा देखा| आज एक अचम्भा...

कठघरा

मंदिर किन्हीं ख़ास अभिजात्य वर्ग के लिए तब भी ऐशगाह थे, आज भी हैं और हमेशा रहेंगे और रहेंगे, रहेंगे तब तलक! जब तलक किसी किसी भी मूर्त्ति को वहाँ से जाता नहीं निकाला, किया जाता कठघरे में खड़ा और जाता पूछा, बताओ हर ऐश के हिस्से में तुम्हारा क्या किस्सा है, और इस किस्से के कितने हिस्से में झूमा कौन सा फलक? पर कठघरे में खड़ा किया जाना ज़्यादा  ज़रूरी है|