Posts

Showing posts from May 7, 2017

अरे साहित्य!

अरे साहित्य ये तेरे गर्भगृह का बेजान खज़ाना| हरकतों से  दलित और तारीफों पे राजपूताना|| परवरिश का ज़ोर है कोई सुनने का चोर है| नीयत है बेसाहनी अब कहीं तौर कहीं टौर है|| किरमिचों की नुमाइश में फँसे बंदे और बंदियाँ| बस यहाँ-वहाँ अदा-बदा का नया पुराना ज़ोर है|| रोज़ाना की अख़बार तकलीफें समेटे जिस्म में| ख्वाहिशों पे नमक और ज़ुबाँ पे मीठा पुरज़ोर है|| डाइनिंग टेबल से उठी ज़ुबाँ किताबों पे खामोश अब| ये जो ज्ञान है बोध है बस पल दो पल का जोश है| तुम्हारे कान पे तारीफों से सिमटे हैं जो 'नाज़िर'| सावधान अब तुम्हारी या उनकी कुंडली में दोष है| : © "Ankush Arya", 2017