विहंगम विश्वास
ये पथरीले-रेतीले जंगल, ये ज़िंदा सांस लेते सागर-महासागर|
हाँ ये वही बासी बहती हवा पे ताज़ी गुनगुनाती धूप|
सब तेरे लिए है और उन सबके लिए जो तेरे लिए हैं|
इस डिब्बे में बंद सारी मिश्री सी यादें और मिश्री पे बैठी
वो काली सी चींटी जिसके पंख भी कनक से सजे हैं
वो अभी खनककर उड़ी है और बैठी है उस घड़ी पे
जो तेरे स्वेद-श्रम-सम मोतियों से सजी है|
और उसकी टिकटिक से आवाज़ इतनी ऊंची
कि मुड़के लोग पूछेंगे ये घड़ी-अड़ी किसलिये है|
कहना कुछ भी तुम्हारा कभी नहीं होगा काफी
मेरी ज़मीं इसलिए है मेरा आसमां उसलिए है|
जोड़ना पड़ेगा पंखों से पीर को
और बनना पड़ेगा खुदसा 'नज़ीर' को
वरना ये विहंगम विश्वास किसलिए है?
१. कनक - Gold
२. स्वेद - Sweat
३. पीर - Agony + Faqir
४. नज़ीर - Perfect Example
५. विहंगम - Huge
और बनना पड़ेगा खुदसा 'नज़ीर' को
वरना ये विहंगम विश्वास किसलिए है?
२. स्वेद - Sweat
:© "Ankush Arya", 2017

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