परमानेंट

कभी चिपकाई थी बिंदी शीशे पे ड्रेसिंग टेबल के|
हालात बने ऐसे रहे कि परमानेंट हो गई| 

चलते रहे, आहें आती रहीं, इस एक्सीडेंटल प्यार में|
मीठी सी गलती यहाँ पूरा वारंट हो गई|

पहले कशिश फिर कोशिश बाद बेबाक शरारतें|
धीमे से ख़ुशबुऐं यहाँ कोलोन से सेंट हो गईं|

उफ़ ये मुस्कुराहटें फिर तरेरना कभी ओंठ काटने|
धीमे-धीमे कॉलें यहाँ वेडिंग टेंट हो गईं|

कुछ मुलाकातें थोड़े ख़्याल चंद ख़्वाब कैसे रहे|
अर्थिंग से ज़िन्दगी आखिर मस्त करंट हो गई|

कोई पूछेगा तो आखिर में आप कहोगे क्या?
मुस्कुरायेंगे, समझ जाना, यादें परमानेंट हो गईं|



- © अंकुश कुमार, इट्स लार्जर देन लाइफ, ग़ज़ल नहीं रे, मुहब्बत!

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