ओह! तो तुम हो ठोकर|


चश्मदीदों ने कहा आँखो ही आँखों में नक़ल आती है|
बादाम नहीं ठोकर नहीं अब ठोकरों से यहाँ अकल आती है||

कहीं किसी का चित-चोर है कहीं किसी का मन-मोर| 
पके बालों में ही अक्सर ज़िन्दगी की फसल आती है||

सलोना-सलोनी, गुड्डा-गुड़िया यहाँ खेल सब जानते हैं|
राजनीति-साजनीति में यहाँ हर घर की शकल आती है||

तारीफों के चुनिंदा पुलिंदों ने मुहों को बांधा है आजकल| 
वरना तेज़ाब की बारिश कहाँ अब असर लाती है||

खाली की बातें हैं वी. आई. पी. कल्चर ख़त्म करने की|
अभी तो हासिल में ही सबकी दुर-दूर नज़र जाती है||

चाहे नेता या पुलिस या हो चोर नहीं फिर अफ्स्पा|
सबकी यारी-बेकारी देश में बस कलह लाती हैं||

:© "Ankush Arya", 2017

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