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Showing posts from April 9, 2017

बस आजकल!

कई धड़ों में बंटा है कवि आजकल! कुछ का राम कुछ का रावण तो कुछ शंबूक खासकर! सभी की अपनी उम्मीदें और सब के खास शिकार और व्यापार। कहीं बिछे पुल तारीफ़ों के कहीं आगज़नी, दुत्कार, धिक्कार, तिरस्कार। राम आये सुख-दुःख बांटने। रावण भी आये सुख का आश्वासन देने। दोनों में अब कुछ खास विरोधाभास नहीं है। तब से नाहक का बंटवारे और आश्वासन पर, विश्वास नहीं है। क्यूँकि राम के पास सुख का बंटवारा नहीं है। और रावण के पास देने को बस उम्मीद है। यहाँ घोर काल में इसीलिए नाहक खास मुरीद हैं। कई धड़ों में बंटा है कवि आजकल। क्यूँकि मुंह तो किसी के पास, है ही नहीं आजकल! : © "Ankush Arya", 2017