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माहौल आज-कल!

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At your service majesty जंगलों में जिनके आज-अभी  अवशेष रहते हैं|  हक़ीक़त है इतने ही हौसले आखिर में शेष रहते हैं|| अख़बार या दीवार  को जो ख़ास हैं कहते|  अंदर भी उन्हींके कई-कई भेस रहते हैं|| जो हाथ-पैरों को आवाज़ से महफ़ूज़ रख लेते| झोली में उन्हीं की मुकम्मल लोग रहते हैं|| चलन है मीडिया कुछ भी फैला दो दार हो चाहे| आस्तीनों में उन्हीं की कहीं पर सांप रहते हैं || सनातनी की तनातनी  या आर्यसमाज का खाना | गुज़रना मत कभी यहाँ पर नीच रहते हैं || माहौल नफ़रत का तुम भी सहयोग दो थोड़ा| लोगों का काम है लड़ना लो हम हाथ देते हैं || भेस                      =                Compositions/Faces. महफ़ूज़                =                Preserved. मुकम्मल             =             ...

अजगर बैठे हैं!

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Name shouldn't be enough. यहाँ बस खामखां बुतों से लिपटे हैं लोग| बाकी दुनिया में  कोई धंधा परेशानी नहीं है||  कभी इंशाअल्लाह तो कभी भगवान भला करेगा| तमाशा है क्या बेटा! ज़िन्दगी है कोई नादानी नहीं है|| बयार पे लिपटी जमात खड़खड़ाते पत्तों सी हो गई| बुढ़ापा है! बचपना है! यहाँ बस जवानी नहीं है|| होठों और मुँह पे चिपके हैं थप्पड़ और गालियां| समाज में आदत है! फ़ख्र है! ये कोई बीमारी नहीं है|| तारीफ़ों के हैं झूठे फ़ूल और बहती हैं मतलब की नदियाँ| बाकी मेहनत की कोई यहाँ बागबानी नहीं है|| कभी कहते हैं काट देंगे गला चीर देंगे सीना पी जाएंगे खून| हाह! हँसी आती है, ये कोई गौमूत्र या जमजम का पानी नहीं है|| : © "Ankush Arya", 2017

काफ़िर के जज़्बात

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Add caption ऐसा भी कोई मसला नहीं था हुज़ूर | इंज़ील  जो  हिचकियों में मसल डाला||  दोज़ख से भी ना घबराये जानिब कभी|  जो हुकुम ने दिया  तरेर और डरा डाला||  क्या कज़ा क्या शिकन लाये माथे पर|  जो तारीफ़-ए-बयार  की अदा ने फना डाला|| मुद्दतों के सपने और ज़िंदादिली ये ज़िंदा | तिरि तहरीकों ने काफिर-ज़िंदा-बुत बना डाला|| कभी घुटनों पे टिके तो कहीं वुज़ू में हैं झुके | साज़िश है ! कहाँ  नमाज़ी थे  कहाँ काफ़िर  बना डाला|| अब इन जुलूसों में कहाँ टिक पायेंगे  बुतपरस्त | ' नज़ीर ' इन नज़रों ने कभी बना डाला कभी  मिटा डाला || 1. इंज़ील                        =                              Grim The Reaper 2.  दोज़ख                         =            ...

ओह! तो तुम हो ठोकर|

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चश्मदीदों ने कहा आँखो ही आँखों में नक़ल आती है| बादाम नहीं ठोकर नहीं अब ठोकरों से यहाँ अकल आती है|| कहीं किसी का चित-चोर है कहीं किसी का मन-मोर|  पके बालों में ही अक्सर ज़िन्दगी की फसल आती है|| सलोना-सलोनी, गुड्डा-गुड़िया यहाँ खेल सब जानते हैं| राजनीति-साजनीति में यहाँ हर घर की शकल आती है|| तारीफों के चुनिंदा पुलिंदों ने मुहों को बांधा है आजकल|  वरना तेज़ाब की बारिश कहाँ अब असर लाती है|| खाली की बातें हैं वी. आई. पी. कल्चर ख़त्म करने की| अभी तो हासिल में ही सबकी दुर-दूर नज़र जाती है|| चाहे नेता या पुलिस या हो चोर नहीं फिर अफ्स्पा| सबकी यारी-बेकारी देश में बस कलह लाती हैं|| : © "Ankush Arya", 2017

इल्ज़ाम किसको?

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गरीब नशे में है तो क्या हुआ, तुम भी तो कहकशे में हो| दुनिया दरबदर हो तो क्या ग़म, फख्र में हो लहज़े में हो|| तहज़ीबों से पर्दा उठाना जायज़ समझो गर| आबाद रखो खुदको, क्यूंकि फ़कत तकलीफ़ में हो|| हाथों से नहीं तो आंखों से थाम लेना खुदको| क्यूंकि जम्हूरियत का कहा ग़लत ना होगा, फ़कीरी में हो|| ग़मों की नुमाइश अब्र से कभी ना करना| लगेगा ऐसा ज़रूरत नहीं पर हक़ीक़त में हो|| ज़माना भूले बिसरे, तुम पर ज़रूर याद रखना| समझते देर नहीं लगती नज़ीर कि तुम नशे में हो|| 1. कहकशा        =                   The road to the stars. 2. जम्हूरियत    =                   Democracy. 3. अब्र               =                   Cloud. : © "Ankush Arya", 2017

उसूल है तो संदूक है

ये बेनज़ीर*-बेवजह, तुम नज़रों को उठाये।         अनकही-कहीं ताके-बताके जाये जा रहे हो।। उन तारों को, ना दूरबीन ना दूरंदीद के।         बेहया-बेहिचक लगार * -वार सताये जा रहे हो।। गाँव की ज़मीनों पे, ना रखो करम-नज़रें।         सियासी ज़मीन पे आस अड़ाये जा रहे हो।। ये सर्रर्रर्र सी आवाज़, मदहोशी का आलम।         *ब ताशों पे क्यूँ नज़रबाज़ गड़ाये जा रहे हो।। कुछ खास हो  गर तो  पैबस्त* कर लो नफ़्स* में।         क्यूँ रेज़े-रेज़े* पे हाईलाईटर घुमाये जा रहे हो।। इन बेरौनक हवाओं में, पैरहन* से दुश्मनी।         फ़िर क्यूँ सर्दी में शिकायत जमाये जा रहे हो ।। *बेनज़ीर- बिना किसी नज़रिये के, *लगार- क्रम, सिलसिला *ब- कुशलतापूर्वक, *पैबस्त- कसकर समेट लेना, *नफ़्स- आत्मा, *रेज़े- (बहुवचन) रेज़ा, छोटी से छोटी चीज़, *पैरहन- पहना जाने वाला लंबा सा कोट। : © "Ankush Arya", 2017

कड़वा लगा ना!

देख रही हूँ बहुत देर से  हद  गंदे से घूरते ही हुए,  कुछ परेशान हो? अरे दोस्ती के पीछे ही पड़े हो बिना जान-पहचान के,  समझो, अंजान हो! तुम तो पीछा कर-करके गली तक भी आ गये,  कहो श्वान् हो? इंसानियत की खातिर वर्चुअली पीछा छोड़ो,  मर्ज़ इंसान हो! कैसे हुई हिम्मत जो अचानक हाथ लगाने लगे,  नालायक! हैवान! हो।। अरे कैसे घूम रहे हो गोल-गोल पिट-पिटकर,  अरे! खेतान हो? साहब मिलने आईं हैं कोई बच्चियां आपसे,  कोई पहचान हो? काफ़ी मशहूर लग रहे हैं आप कारागार में,  लगता है शान हो? : © "Ankush Arya", 2017

यही धोखा है

उनकी आँखें सवेरा थी किसी का। टूटी इमारतें बसेरा थीं किसी का॥ परछाइयों के पीछे छिप गयी हैं वो। जो कभी आँखें पहरा थीं किसी का॥ वक्त को थामकर जाना था जिन्हें आगे। काल के गाल में चेहरा छुपा है उन्हीं का॥ गलती का मतला ही पता ना था जिनको। हार का कहर अब उन्हें पता है कभी का॥ दरम्याँ ही चलना जो समझते थे मुनासिब। खाक और राख में वक्त ठहरा उन्हीं का॥ आलीशान थे जिनके कभी महलों के ख्वाब। अब कहाँ वो मज़ार नाम तो लो सरज़मीं का॥ कुदरत के बंदे हो फ़ितरत से मिल लेना। नज़ीर ख्वाबों का क्या चांद ठहरा किसी का॥

खिलाफ़त भी ज़रूरी है

कहीं कभी इज़हार से पहले इश्क़ हो ना जाये। कहीं कभी इकरार ये अहले मुश्क खो न जाये॥ हाथों को अपने थाम लेंगे जेबों से, पर डर है। कहीं ये कब्ज़े रियायत में जाम हो ना जायें॥ ये शबनमी नरगिस  में बयार का असर देखो। ये उड़ता हुआ तीर, दिल के आर-पार हो ना जाये॥ मानो तराश रहे हों कलम से तुझको कारीगर लाख। तुझमें जान फ़ूँककर आशिक़गर लाश हो ना जायें॥ बाँध ली हैं जो तूने तितलियाँ करम पर। यहाँ कुदरत में खुदगर्ज़!  बग़ावत हो ना जाये॥ अल्फ़ाज़ होंगे ताक पर, कसूर ज़िबा का होगा। दीद से बातों में ही कहीं इश्क़ हो ना जाये॥ पर कभी इबादत तो कभी खिलाफ़त । के बहाने मुलाक़ात हो जो जाये॥

नज़्म और नब्ज़

हसीन लाख सही मगर ख्वाब ही तो है, रंगीन चश्मे भी मगर रात ही तो है। तुम कपड़े बदल लोगे, तुम सपने बदल दोगे। पर बचपन का क्या, जो खैर याद ही तो है।। हर वक्त करवट जागीर को सुस्ताना ही पड़ेगा। उस दरख्त का क्या कुसूर जो शहतीर ही तो है।। अश्क-ए-दरिया को क्या आज बहे चाहे कल। वरना नमकीन पानी में क्या दर्द ही तो है।। इन चश्मों से निकलती आग को ज़रा थाम लेना। वरना दोज़ख़ भी मतलब से पाक ही तो है।। कंधों पे झुके हो कहीं हिल ना पड़ना। इस नामाकूल वजन का क्या बोझ ही तो है।। नज़्मों से मिले सुकूं तो ज़रा पंख बोना। अजी इस चाहत का क्या साख ही तो है।। हाथ मिलाना, गले मिलना और गर्मजोशी। बीमार इज़्ज़त का क्या नब्ज़ ही तो है।। दुआओं में बसेंगे लोग चाहने वालों के। अदायगी जिस्म का क्या खाक-राख ही तो है।।