कड़वा लगा ना!

देख रही हूँ बहुत देर से हद गंदे
से घूरते ही हुए, कुछ परेशान हो?

अरे दोस्ती के पीछे ही पड़े हो बिना
जान-पहचान के, समझो, अंजान हो!

तुम तो पीछा कर-करके गली
तक भी आ गये, कहो श्वान् हो?

इंसानियत की खातिर वर्चुअली
पीछा छोड़ो, मर्ज़ इंसान हो!

कैसे हुई हिम्मत जो अचानक
हाथ लगाने लगे, नालायक! हैवान! हो।।

अरे कैसे घूम रहे हो गोल-गोल
पिट-पिटकर, अरे! खेतान हो?

साहब मिलने आईं हैं कोई
बच्चियां आपसे, कोई पहचान हो?

काफ़ी मशहूर लग रहे हैं आप
कारागार में, लगता है शान हो?

:© "Ankush Arya", 2017

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