यही धोखा है

उनकी आँखें सवेरा थी किसी का।
टूटी इमारतें बसेरा थीं किसी का॥

परछाइयों के पीछे छिप गयी हैं वो।
जो कभी आँखें पहरा थीं किसी का॥

वक्त को थामकर जाना था जिन्हें आगे।
काल के गाल में चेहरा छुपा है उन्हीं का॥

गलती का मतला ही पता ना था जिनको।
हार का कहर अब उन्हें पता है कभी का॥

दरम्याँ ही चलना जो समझते थे मुनासिब।
खाक और राख में वक्त ठहरा उन्हीं का॥

आलीशान थे जिनके कभी महलों के ख्वाब।
अब कहाँ वो मज़ार नाम तो लो सरज़मीं का॥

कुदरत के बंदे हो फ़ितरत से मिल लेना।
नज़ीर ख्वाबों का क्या चांद ठहरा किसी का॥

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