नज़्म और नब्ज़

हसीन लाख सही मगर ख्वाब ही तो है,
रंगीन चश्मे भी मगर रात ही तो है।

तुम कपड़े बदल लोगे, तुम सपने बदल दोगे।
पर बचपन का क्या, जो खैर याद ही तो है।।

हर वक्त करवट जागीर को सुस्ताना ही पड़ेगा।
उस दरख्त का क्या कुसूर जो शहतीर ही तो है।।

अश्क-ए-दरिया को क्या आज बहे चाहे कल।
वरना नमकीन पानी में क्या दर्द ही तो है।।

इन चश्मों से निकलती आग को ज़रा थाम लेना।
वरना दोज़ख़ भी मतलब से पाक ही तो है।।

कंधों पे झुके हो कहीं हिल ना पड़ना।
इस नामाकूल वजन का क्या बोझ ही तो है।।

नज़्मों से मिले सुकूं तो ज़रा पंख बोना।
अजी इस चाहत का क्या साख ही तो है।।

हाथ मिलाना, गले मिलना और गर्मजोशी।
बीमार इज़्ज़त का क्या नब्ज़ ही तो है।।

दुआओं में बसेंगे लोग चाहने वालों के।
अदायगी जिस्म का क्या खाक-राख ही तो है।।

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