खिलाफ़त भी ज़रूरी है

कहीं कभी इज़हार से पहले इश्क़ हो ना जाये।
कहीं कभी इकरार ये अहले मुश्क खो न जाये॥

हाथों को अपने थाम लेंगे जेबों से, पर डर है।
कहीं ये कब्ज़े रियायत में जाम हो ना जायें॥

ये शबनमी नरगिस  में बयार का असर देखो।
ये उड़ता हुआ तीर, दिल के आर-पार हो ना जाये॥

मानो तराश रहे हों कलम से तुझको कारीगर लाख।
तुझमें जान फ़ूँककर आशिक़गर लाश हो ना जायें॥

बाँध ली हैं जो तूने तितलियाँ करम पर।
यहाँ कुदरत में खुदगर्ज़!  बग़ावत हो ना जाये॥

अल्फ़ाज़ होंगे ताक पर, कसूर ज़िबा का होगा।
दीद से बातों में ही कहीं इश्क़ हो ना जाये॥

पर कभी इबादत तो कभी खिलाफ़त
के बहाने मुलाक़ात हो जो जाये॥

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