साये में
तुम रेत के वीरान दरम्याँ निकली नदी सी हो।
इसराफ़१ खुर्द२ ख्वाहिशों पे तक़रीबन नबी३ सी हो।।
वक्त को भी सब खबर है, वक्त का ही तो असर है।
सज़दे में तिरे सिर झुकाये हमको तेरी किस कदर है।
नाज़िम४ बन बैठे है दुश्मन, नाज़िर५ बने हुये हैं दोस्त।
खुसफ़ुसाते हैं कान में, जो तबियत ज़रा वहमी सी हो।।
तेरे कंधे, तेरी गर्दन पे अड़े वो खुदरे६ खुरदुराते निशान।
साझा सवाल हैं, जाहिर जवाब, हैं या खुद खालिस बयान।
गर नज़र होती आज भी तो बहल जाता मेरा मन।
पर बारिशों से पूछुँ अब, क्या मेरी गलतफ़हमी सी हो॥
कशसफ़े७ पे तुझे याद रखना मेरी आदत बन चुकी।
अब तबियत मेरी तबियत तेरी, ताउम्र आई ढल चुकी।
हर्फ़८, किस्सों में बदलने चला खुदको कुछ यूँ आज अब।
तीरगी९ के अक्स मानो तुम खुद खुशफ़हमी सी हो।।
तुम रेत के वीरान दरम्याँ निकली नदी सी हो।
इसराफ़ खुर्द ख्वाहिशों पे तक़रीबन नबी सी हो।।
- इसराफ़ - असाधारण
- खुर्द - सूक्ष्म
- नबी - मसीहा
- नाज़िम - मैनेजर
- नाज़िर - दर्शक
- खुदरा - छोटी वस्तु
- कशसफ़ा- वेंटीलेटर
- हर्फ़ - अक्षर
- तीरगी - अंधेरा
:© "Ankush Arya", 2017
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