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जज़्बात

नज़ीर पूछे जज़्बातों से बोलो तुम क्या कहते हो, जज़्बातों की वकील बानी ज़िबां, बोली ये कहाँ कुछ कहते हैं? ये तो बस ज़िंदा रहते हैं| इन्हें मरना आया ही नहीं, समय के साथ भीष्म मरे, बुद्ध मरे, मरे अनेक शरीर, राम मरे, कृष्ण मरे, रहे जज़्बात अधीर| ये तब भी थे, ये आज भी हैं, ये कल-परसों पे सवार और आगे भी रहेंगे, ये धृतराष्ट्र-गांधारी में भी थे, सुभद्रा-अर्जुन में भी, ये हैं बुद्ध-यशोधरा में भी, रह रहे लव कुश में भी| ये जगह नहीं बदला करते, बदलती हैं तो बस तारीखें, लोग, अंदाज़, हिसाब-किताब, और ये बस मजबूरियां| ये ज़िंदा रहते हैं, ये कुछ नहीं कहते बस देखते रहते हैं| हाँ पर इन्हें  चाहिए हूँ मैं, मेरे दोस्त, ज़ाहिर करने को अलफ़ाज़, हाव-भाव से, गुस्सा-मुहब्बत-अफ़सोस| हम चले जाते हैं, समय के साथ, ये ज़िंदा रहते हैं, ये कहाँ कुछ कहते हैं, ये तो बस ज़िंदा रहते हैं| - © अंकुश कुमार 

अचम्भा

आज एक अचम्भा देखा| वक्त जैसे थमा सा देखा| जितना देखा उतना परखा| चोरों को भी अखरा देखा| बात पुरानी बीत गयी जब| नींद सयानी रूठ गयी तब| जितना जब भी मैंने परखा | अजब गज़ब सा चरखा देखा| आज एक अचम्भा... बीत चुका है सोमवार अब| बार वार की बारी है सब| परखो तुम भी ऐसा परखा| कहना क्या-क्या वखरा देखा| आज एक अचम्भा...

कठघरा

मंदिर किन्हीं ख़ास अभिजात्य वर्ग के लिए तब भी ऐशगाह थे, आज भी हैं और हमेशा रहेंगे और रहेंगे, रहेंगे तब तलक! जब तलक किसी किसी भी मूर्त्ति को वहाँ से जाता नहीं निकाला, किया जाता कठघरे में खड़ा और जाता पूछा, बताओ हर ऐश के हिस्से में तुम्हारा क्या किस्सा है, और इस किस्से के कितने हिस्से में झूमा कौन सा फलक? पर कठघरे में खड़ा किया जाना ज़्यादा  ज़रूरी है|

विहंगम विश्वास

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ये पथरीले-रेतीले जंगल , ये ज़िंदा सांस लेते सागर-महासागर | हाँ ये वही बासी बहती हवा पे ताज़ी गुनगुनाती धूप | सब तेरे लिए है और उन सबके लिए जो  तेरे लिए हैं | इस डिब्बे में बंद सारी मिश्री सी यादें और मिश्री पे बैठी वो काली सी चींटी जिसके पंख भी कनक से सजे हैं वो अभी  खनककर उड़ी है और बैठी है उस घड़ी  पे जो तेरे स्वेद-श्रम-सम मोतियों से सजी है| और उसकी टिकटिक से आवाज़ इतनी ऊंची कि मुड़के लोग पूछेंगे ये घड़ी-अड़ी  किसलिये है| कहना कुछ भी तुम्हारा कभी नहीं होगा काफी मेरी ज़मीं इसलिए है मेरा आसमां उसलिए है | जोड़ना पड़ेगा पंखों से पीर  को और बनना पड़ेगा खुदसा 'नज़ीर' को वरना ये विहंगम विश्वास किसलिए है? १. कनक    -       Gold २. स्वेद      -       Sweat ३. पीर        -      Agony + Faqir ४. नज़ीर    -       Perfect Example ५. विहंगम -       Huge : © "Ankush Arya", 2017 ...

जो भी समझो!

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ऐसा मैं क्या लिख दूँ अब! इक सम्यक सा झूठ लिखूँ या कहूँ तिलमिलाया सच, अपनी तीखी जुबां घोल दूँ या पीलूँ मैं अब आहें सब, तेरी तारीफों पे तारीफें कर दूँ या करुँ मन खुरदुरा अब, तेरा सवाल मेरा जवाब या मेरे सवाल तेरे जवाब, तरन्नुम पे हालात लिख दूँ या ज़हर भरे से कड़वे शब्द, बेगानी बातें सब लिख दूँ या लिख दूँ दिल की हालत अब! मेरा कहा अपना अनकहा जो भी तूने झेला होगा! तेरा भी कुछ बयान होगा जो कुछ तूने ठेला होगा! मैंने तुझसे तूने मुझसे जो कुछ थोड़ा खेला होगा! ख़ास खराबी होंगी मुझमें पर थोड़ी-थोड़ी सबमें  होंगी, कहना जो कुछ होगी शिकवा जिनसे भी मन दहला होगा! तेरी आँखें  पत्थर हो जब नाम कुरेदना मेरा तब| नहीं मिटेगा अमिट रहेगा मेहंदी-रोली टीका रब| हाथ सभी हों जब गज-बज घर-भर को सजाना तब| अमर रहेंगे अजर कहेंगे शीशा-तुलसी दर पे सब| ऐसा मैं क्या लिख दूँ  अब! सम्यक                       =                        ...

साये में

तुम रेत के वीरान दरम्याँ निकली नदी सी हो। इसराफ़ १   खुर्द २ ख्वाहिशों पे तक़रीबन नबी ३ सी हो।। वक्त को भी सब खबर है , वक्त का ही तो असर है। सज़दे में तिरे सिर झुकाये हमको तेरी किस कदर है। नाज़िम ४ बन बैठे है दुश्मन ,  नाज़िर ५ बने हुये हैं दोस्त। खुसफ़ुसाते हैं कान में , जो तबियत ज़रा वहमी सी हो।। तेरे कंधे , तेरी गर्दन पे अड़े वो खुदरे ६ खुरदुराते निशान। साझा सवाल हैं , जाहिर   जवाब ,  हैं   या खुद खालिस बयान। गर नज़र होती आज भी तो बहल जाता मेरा मन। पर बारिशों से पूछुँ अब , क्या मेरी गलतफ़हमी सी हो॥ कशसफ़े ७   पे   तुझे याद रखना   मेरी आदत बन चुकी। अब तबियत मेरी तबियत तेरी , ताउम्र आई ढल चुकी। हर्फ़ ८ , किस्सों में बदलने चला खुदको कुछ यूँ आज अब। तीरगी ९   के अक्स मानो तुम खुद खुशफ़हमी सी हो।। तुम रेत के वीरान दरम्याँ निकली नदी सी हो। इसराफ़   खुर्द ख्वाहिशों...

बस इक याद ही तो है

उन बंद गुम कमरों को बताना उनकी नींव पक्की थी, उन ताकतवर दरवाज़ों से कहना उनकी तबियत अच्छी थी, उस डगमगायी ड्योढ़ी को छेड़ना उनकी नीयत तरक्की थी, उन खुरदुरी सीढ़ियों पर भी बैठकर फ़िर फूलों पे नज़र करना और उन खुश्क गुलों से कहना उनकी खुश्बू सच्ची थी| याद क्यूँ नहीं होंगे आज भी वो अभी कल ही की तो बात है, तुम हो, मैं हूँ, सब हैं, ये जो सोच-दिन हैं और यादरात हैं। वो जो नदी बहती थी याद होगी तुम्हें? ना वो कल-कल बहती थी ना ढुल-ढुल लुढ़कती| उसकी अंदाज़-ए-रवानगी ही कुछ और थी याद होगी तुम्हें? उसका भी बयान रुकता था हर साल जेठ दुपहरी में, हर सूखते गले की अठखेलियाँ तो याद होंगी तुम्हें? पर फिर उन सभी यादों के आंगन, क्यारी, नावों पर खास अपना नाम उकेरना मत भूलना; और ये याद करना तुम कितने ज़रूरी हो! : © "Ankush Arya", 2017

अक्सर हादसे ही हुआ करते

दु:ख देने वालों की आँखों से,             आँसू नहीं चुआ करते। राजनीति में क्यूँकि अक्सर,             हादसे नहीं हुआ करते॥ जो छिटपुट-छिटपुट बातों में,             बातों के तीर चलाते हैं। उनके ही दामन में अक्सर,             घनघोर घाव हुआ करते॥ राजनीति में क्यूँकि अक्सर... मेहनतकश परिवार को जो,             जातिगत बतलाते हैं। विद्या के अधिकार को जो,             नीच बोल धकियाते हैं। उनके ही घुटनों पर अक्सर,             ज़ालिम दर्द हुआ करते॥ राजनीति में क्यूँकि अक्सर... वारदात करने पर जो,        ...

नाक बीच में है

लोग ही कहते हैं अक्सर,             सेहत बहुत ज़रूरी है। हाथों में पड़ते छालों की,             मेहनत बहुत ज़रूरी है। ख्वाबों को जीते जाने में,             हरकत बहुत ज़रूरी है। कहाँ हैं अज़ीम नसीहत वाले,             गये कहाँ गुलकंदी वाले। नाक नापने ताज़ आँकने,             गये कहाँ घर के घरवाले? कौन खा गया सारी कतली,             कौन खा रहा राख-रोटी? आँख लग आयी हैं अबकी             सबकी नुचेंगी बोटी-बोटी। कुत्तों को ढोने वाले,             रखवाले भी ज़रूरी हैं? हाथ जोड़कर पड़ने वाले ...

हर दर्द का ज़मींदोज़ होना

ज़मींदोज़ हुई ज़मीं,        ज़मीं पर बने खेत,               खेतों पर बहती नदी,                      आब पर बसा वायुदाब। और सब पर मनुष्य का प्रताप। आग हवा जल जंगल ज़मीं। सब एक के ऊपर एक, और सब पर आदमी। सभी पर सभ्यता की लकीरें खींची सभी मिटीं। ना बची सभ्यता ना बचा आदमी । बचा या बचा क्या सवाल होगा, किसका बचाव होगा? गर कुछ बचा तो बस, आग हवा जल जंगल ज़मीं। ज़मींदोज़ हुई ज़मीं,        ज़मीं पर बने खेत,               खेतों पर बहती नदी,                      आब पर बसा वायुदाब।