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काफ़िर के जज़्बात

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Add caption ऐसा भी कोई मसला नहीं था हुज़ूर | इंज़ील  जो  हिचकियों में मसल डाला||  दोज़ख से भी ना घबराये जानिब कभी|  जो हुकुम ने दिया  तरेर और डरा डाला||  क्या कज़ा क्या शिकन लाये माथे पर|  जो तारीफ़-ए-बयार  की अदा ने फना डाला|| मुद्दतों के सपने और ज़िंदादिली ये ज़िंदा | तिरि तहरीकों ने काफिर-ज़िंदा-बुत बना डाला|| कभी घुटनों पे टिके तो कहीं वुज़ू में हैं झुके | साज़िश है ! कहाँ  नमाज़ी थे  कहाँ काफ़िर  बना डाला|| अब इन जुलूसों में कहाँ टिक पायेंगे  बुतपरस्त | ' नज़ीर ' इन नज़रों ने कभी बना डाला कभी  मिटा डाला || 1. इंज़ील                        =                              Grim The Reaper 2.  दोज़ख                         =            ...

फ़र्क पड़ेगा क्या?

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तुम हँस पड़े हो जो, अपने दायरों और दायित्वों से बाहर आके। बदलना-निगलना चाह रहे हो, अपने खाके और खाके पर खाके। ये जो गर्मजोशी तुमने तमाम नज़र, ज़मीन और बदन पर लिपटाई हुई है। आज वो इस कदर तुमसे चिपकी है, मानो वो 'की' नहीं है, 'काई' हुई है। ये सफर नम्र-विनम्र दास्तानों से शुरु होकर ख़त्म अब ख़त्म होने पर ही होगा। जिस भी क़िताब से पन्ना फटा था या फाड़ा, उस आधार पर नया अध्याय होगा। आरज़ू और जुस्तजू के जंगलों को इकतरफा​ ज़िक्र में भी बर्फ देना अब। ओरों-पोरों के जलों को तारीफ-ए-शबनम पर भी नमी की ज़मीं देना अब। किस्से-कहानियों की नुमाइश में कुचलों-पिछड़ों​ के सबको जगह मिलेगी। तुम जन्म कुंडली बांचो या बांटो भविष्य के पर्चे, ख़बर ज़रूर मिलेगी तुमको ख़बर ज़रूर मिलेगी। : © "Ankush Arya", 2017

ओह! तो तुम हो ठोकर|

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चश्मदीदों ने कहा आँखो ही आँखों में नक़ल आती है| बादाम नहीं ठोकर नहीं अब ठोकरों से यहाँ अकल आती है|| कहीं किसी का चित-चोर है कहीं किसी का मन-मोर|  पके बालों में ही अक्सर ज़िन्दगी की फसल आती है|| सलोना-सलोनी, गुड्डा-गुड़िया यहाँ खेल सब जानते हैं| राजनीति-साजनीति में यहाँ हर घर की शकल आती है|| तारीफों के चुनिंदा पुलिंदों ने मुहों को बांधा है आजकल|  वरना तेज़ाब की बारिश कहाँ अब असर लाती है|| खाली की बातें हैं वी. आई. पी. कल्चर ख़त्म करने की| अभी तो हासिल में ही सबकी दुर-दूर नज़र जाती है|| चाहे नेता या पुलिस या हो चोर नहीं फिर अफ्स्पा| सबकी यारी-बेकारी देश में बस कलह लाती हैं|| : © "Ankush Arya", 2017

साये में

तुम रेत के वीरान दरम्याँ निकली नदी सी हो। इसराफ़ १   खुर्द २ ख्वाहिशों पे तक़रीबन नबी ३ सी हो।। वक्त को भी सब खबर है , वक्त का ही तो असर है। सज़दे में तिरे सिर झुकाये हमको तेरी किस कदर है। नाज़िम ४ बन बैठे है दुश्मन ,  नाज़िर ५ बने हुये हैं दोस्त। खुसफ़ुसाते हैं कान में , जो तबियत ज़रा वहमी सी हो।। तेरे कंधे , तेरी गर्दन पे अड़े वो खुदरे ६ खुरदुराते निशान। साझा सवाल हैं , जाहिर   जवाब ,  हैं   या खुद खालिस बयान। गर नज़र होती आज भी तो बहल जाता मेरा मन। पर बारिशों से पूछुँ अब , क्या मेरी गलतफ़हमी सी हो॥ कशसफ़े ७   पे   तुझे याद रखना   मेरी आदत बन चुकी। अब तबियत मेरी तबियत तेरी , ताउम्र आई ढल चुकी। हर्फ़ ८ , किस्सों में बदलने चला खुदको कुछ यूँ आज अब। तीरगी ९   के अक्स मानो तुम खुद खुशफ़हमी सी हो।। तुम रेत के वीरान दरम्याँ निकली नदी सी हो। इसराफ़   खुर्द ख्वाहिशों...

अक्सर हादसे ही हुआ करते

दु:ख देने वालों की आँखों से,             आँसू नहीं चुआ करते। राजनीति में क्यूँकि अक्सर,             हादसे नहीं हुआ करते॥ जो छिटपुट-छिटपुट बातों में,             बातों के तीर चलाते हैं। उनके ही दामन में अक्सर,             घनघोर घाव हुआ करते॥ राजनीति में क्यूँकि अक्सर... मेहनतकश परिवार को जो,             जातिगत बतलाते हैं। विद्या के अधिकार को जो,             नीच बोल धकियाते हैं। उनके ही घुटनों पर अक्सर,             ज़ालिम दर्द हुआ करते॥ राजनीति में क्यूँकि अक्सर... वारदात करने पर जो,        ...