हर दर्द का ज़मींदोज़ होना
ज़मींदोज़ हुई ज़मीं,
ज़मीं पर बने खेत,
खेतों पर बहती नदी,
आब पर बसा वायुदाब।
और सब पर मनुष्य
का प्रताप।
आग हवा जल जंगल
ज़मीं।
सब एक के ऊपर एक,
और सब पर आदमी।
सभी पर सभ्यता की
लकीरें खींची सभी
मिटीं।
ना बची सभ्यता ना
बचा आदमी।
बचा या बचा क्या
सवाल होगा,
किसका बचाव होगा?
गर कुछ बचा तो बस,
आग हवा जल जंगल
ज़मीं।
ज़मींदोज़ हुई
ज़मीं,
ज़मीं पर बने खेत,
खेतों पर बहती नदी,
आब पर बसा वायुदाब।
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