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परमानेंट

कभी चिपकाई थी बिंदी शीशे पे ड्रेसिंग टेबल के| हालात बने ऐसे रहे कि परमानेंट हो गई|  चलते रहे, आहें आती रहीं, इस एक्सीडेंटल प्यार में| मीठी सी गलती यहाँ पूरा वारंट हो गई| पहले कशिश फिर कोशिश बाद बेबाक शरारतें| धीमे से ख़ुशबुऐं यहाँ कोलोन से सेंट हो गईं| उफ़ ये मुस्कुराहटें फिर तरेरना कभी ओंठ काटने| धीमे-धीमे कॉलें यहाँ वेडिंग टेंट हो गईं| कुछ मुलाकातें थोड़े ख़्याल चंद ख़्वाब कैसे रहे| अर्थिंग से ज़िन्दगी आखिर मस्त करंट हो गई| कोई पूछेगा तो आखिर में आप कहोगे क्या? मुस्कुरायेंगे, समझ जाना, यादें परमानेंट हो गईं | - © अंकुश कुमार, इट्स लार्जर देन लाइफ, ग़ज़ल नहीं रे, मुहब्बत!

शुतुरमुर्ग का अंडा

तुम्हारी आँखें जैसे  शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर आँसू ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा तुम्हारा ललाट जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर भी दिमाग ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा तुम्हारा ख्याल जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर फिर सवाल ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... तुम्हारा नक्श जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसीपर हावभाव ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... तुम्हारी खिलखिलाहट जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर मेरी हालत ऐसी-जैसे शुतुरमुर्ग का.... तुम्हारे कुछ ख़यालात जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा फिर मेरे सवालात ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... तुम्हारी गरिमा भी जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा और उसपर फिर इठलाना ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... तेरा आंखें दिखलाना जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा फिर मेरी हरकत बचकाना ऐसी-जैसे शुतुरमुर्ग का... तेरे-मेरे बीच की दीवार जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर मेरे ये हालात ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... मेरे कुछ अरमान जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर तेरे वादे ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... तेरा कहीं खोजाना जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा और उसपर तेरा मिल पाना ऐसे-जैसे...|

औकात की बात!

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Glow worms vs Moon Light तुम्हारे-हमारे  नसीब में टिमटिमाते तारे   कहाँ हम-तुम उन ख्वाबों में हैं  जिनमें कुछ खिड़कियाँ हैं तो कुछ रोशनियाँ |  कुछ लोग ताक रहे हैं  जिसमें एक चांद जो हर रोशनी को रोशन करेगा ना यहाँ ना वहाँ अब वो हालात कहाँ | बारिश थी और होगी होती रहेगी पर रोशनी छिटकाते बादलों की रात कहाँ बरसात कहाँ| जो जहाँ था वो वहीं ठहरा होगा रास्ते हों रोशन वो अब रात कहाँ । सुना था कभी जो  चांद देहरी सोने सी रोशन करता था ना तेरी में ना मेरी में ना झोली में चांद की अब वो रात कहाँ औकात कहाँ | : © "Ankush Arya", 2017

काफ़िर के जज़्बात

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Add caption ऐसा भी कोई मसला नहीं था हुज़ूर | इंज़ील  जो  हिचकियों में मसल डाला||  दोज़ख से भी ना घबराये जानिब कभी|  जो हुकुम ने दिया  तरेर और डरा डाला||  क्या कज़ा क्या शिकन लाये माथे पर|  जो तारीफ़-ए-बयार  की अदा ने फना डाला|| मुद्दतों के सपने और ज़िंदादिली ये ज़िंदा | तिरि तहरीकों ने काफिर-ज़िंदा-बुत बना डाला|| कभी घुटनों पे टिके तो कहीं वुज़ू में हैं झुके | साज़िश है ! कहाँ  नमाज़ी थे  कहाँ काफ़िर  बना डाला|| अब इन जुलूसों में कहाँ टिक पायेंगे  बुतपरस्त | ' नज़ीर ' इन नज़रों ने कभी बना डाला कभी  मिटा डाला || 1. इंज़ील                        =                              Grim The Reaper 2.  दोज़ख                         =            ...

ओह! तो तुम हो ठोकर|

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चश्मदीदों ने कहा आँखो ही आँखों में नक़ल आती है| बादाम नहीं ठोकर नहीं अब ठोकरों से यहाँ अकल आती है|| कहीं किसी का चित-चोर है कहीं किसी का मन-मोर|  पके बालों में ही अक्सर ज़िन्दगी की फसल आती है|| सलोना-सलोनी, गुड्डा-गुड़िया यहाँ खेल सब जानते हैं| राजनीति-साजनीति में यहाँ हर घर की शकल आती है|| तारीफों के चुनिंदा पुलिंदों ने मुहों को बांधा है आजकल|  वरना तेज़ाब की बारिश कहाँ अब असर लाती है|| खाली की बातें हैं वी. आई. पी. कल्चर ख़त्म करने की| अभी तो हासिल में ही सबकी दुर-दूर नज़र जाती है|| चाहे नेता या पुलिस या हो चोर नहीं फिर अफ्स्पा| सबकी यारी-बेकारी देश में बस कलह लाती हैं|| : © "Ankush Arya", 2017

इल्ज़ाम किसको?

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गरीब नशे में है तो क्या हुआ, तुम भी तो कहकशे में हो| दुनिया दरबदर हो तो क्या ग़म, फख्र में हो लहज़े में हो|| तहज़ीबों से पर्दा उठाना जायज़ समझो गर| आबाद रखो खुदको, क्यूंकि फ़कत तकलीफ़ में हो|| हाथों से नहीं तो आंखों से थाम लेना खुदको| क्यूंकि जम्हूरियत का कहा ग़लत ना होगा, फ़कीरी में हो|| ग़मों की नुमाइश अब्र से कभी ना करना| लगेगा ऐसा ज़रूरत नहीं पर हक़ीक़त में हो|| ज़माना भूले बिसरे, तुम पर ज़रूर याद रखना| समझते देर नहीं लगती नज़ीर कि तुम नशे में हो|| 1. कहकशा        =                   The road to the stars. 2. जम्हूरियत    =                   Democracy. 3. अब्र               =                   Cloud. : © "Ankush Arya", 2017

साये में

तुम रेत के वीरान दरम्याँ निकली नदी सी हो। इसराफ़ १   खुर्द २ ख्वाहिशों पे तक़रीबन नबी ३ सी हो।। वक्त को भी सब खबर है , वक्त का ही तो असर है। सज़दे में तिरे सिर झुकाये हमको तेरी किस कदर है। नाज़िम ४ बन बैठे है दुश्मन ,  नाज़िर ५ बने हुये हैं दोस्त। खुसफ़ुसाते हैं कान में , जो तबियत ज़रा वहमी सी हो।। तेरे कंधे , तेरी गर्दन पे अड़े वो खुदरे ६ खुरदुराते निशान। साझा सवाल हैं , जाहिर   जवाब ,  हैं   या खुद खालिस बयान। गर नज़र होती आज भी तो बहल जाता मेरा मन। पर बारिशों से पूछुँ अब , क्या मेरी गलतफ़हमी सी हो॥ कशसफ़े ७   पे   तुझे याद रखना   मेरी आदत बन चुकी। अब तबियत मेरी तबियत तेरी , ताउम्र आई ढल चुकी। हर्फ़ ८ , किस्सों में बदलने चला खुदको कुछ यूँ आज अब। तीरगी ९   के अक्स मानो तुम खुद खुशफ़हमी सी हो।। तुम रेत के वीरान दरम्याँ निकली नदी सी हो। इसराफ़   खुर्द ख्वाहिशों...

बस आजकल!

कई धड़ों में बंटा है कवि आजकल! कुछ का राम कुछ का रावण तो कुछ शंबूक खासकर! सभी की अपनी उम्मीदें और सब के खास शिकार और व्यापार। कहीं बिछे पुल तारीफ़ों के कहीं आगज़नी, दुत्कार, धिक्कार, तिरस्कार। राम आये सुख-दुःख बांटने। रावण भी आये सुख का आश्वासन देने। दोनों में अब कुछ खास विरोधाभास नहीं है। तब से नाहक का बंटवारे और आश्वासन पर, विश्वास नहीं है। क्यूँकि राम के पास सुख का बंटवारा नहीं है। और रावण के पास देने को बस उम्मीद है। यहाँ घोर काल में इसीलिए नाहक खास मुरीद हैं। कई धड़ों में बंटा है कवि आजकल। क्यूँकि मुंह तो किसी के पास, है ही नहीं आजकल! : © "Ankush Arya", 2017

बस इक याद ही तो है

उन बंद गुम कमरों को बताना उनकी नींव पक्की थी, उन ताकतवर दरवाज़ों से कहना उनकी तबियत अच्छी थी, उस डगमगायी ड्योढ़ी को छेड़ना उनकी नीयत तरक्की थी, उन खुरदुरी सीढ़ियों पर भी बैठकर फ़िर फूलों पे नज़र करना और उन खुश्क गुलों से कहना उनकी खुश्बू सच्ची थी| याद क्यूँ नहीं होंगे आज भी वो अभी कल ही की तो बात है, तुम हो, मैं हूँ, सब हैं, ये जो सोच-दिन हैं और यादरात हैं। वो जो नदी बहती थी याद होगी तुम्हें? ना वो कल-कल बहती थी ना ढुल-ढुल लुढ़कती| उसकी अंदाज़-ए-रवानगी ही कुछ और थी याद होगी तुम्हें? उसका भी बयान रुकता था हर साल जेठ दुपहरी में, हर सूखते गले की अठखेलियाँ तो याद होंगी तुम्हें? पर फिर उन सभी यादों के आंगन, क्यारी, नावों पर खास अपना नाम उकेरना मत भूलना; और ये याद करना तुम कितने ज़रूरी हो! : © "Ankush Arya", 2017

अक्सर हादसे ही हुआ करते

दु:ख देने वालों की आँखों से,             आँसू नहीं चुआ करते। राजनीति में क्यूँकि अक्सर,             हादसे नहीं हुआ करते॥ जो छिटपुट-छिटपुट बातों में,             बातों के तीर चलाते हैं। उनके ही दामन में अक्सर,             घनघोर घाव हुआ करते॥ राजनीति में क्यूँकि अक्सर... मेहनतकश परिवार को जो,             जातिगत बतलाते हैं। विद्या के अधिकार को जो,             नीच बोल धकियाते हैं। उनके ही घुटनों पर अक्सर,             ज़ालिम दर्द हुआ करते॥ राजनीति में क्यूँकि अक्सर... वारदात करने पर जो,        ...

खिलाफ़त भी ज़रूरी है

कहीं कभी इज़हार से पहले इश्क़ हो ना जाये। कहीं कभी इकरार ये अहले मुश्क खो न जाये॥ हाथों को अपने थाम लेंगे जेबों से, पर डर है। कहीं ये कब्ज़े रियायत में जाम हो ना जायें॥ ये शबनमी नरगिस  में बयार का असर देखो। ये उड़ता हुआ तीर, दिल के आर-पार हो ना जाये॥ मानो तराश रहे हों कलम से तुझको कारीगर लाख। तुझमें जान फ़ूँककर आशिक़गर लाश हो ना जायें॥ बाँध ली हैं जो तूने तितलियाँ करम पर। यहाँ कुदरत में खुदगर्ज़!  बग़ावत हो ना जाये॥ अल्फ़ाज़ होंगे ताक पर, कसूर ज़िबा का होगा। दीद से बातों में ही कहीं इश्क़ हो ना जाये॥ पर कभी इबादत तो कभी खिलाफ़त । के बहाने मुलाक़ात हो जो जाये॥

नज़्म और नब्ज़

हसीन लाख सही मगर ख्वाब ही तो है, रंगीन चश्मे भी मगर रात ही तो है। तुम कपड़े बदल लोगे, तुम सपने बदल दोगे। पर बचपन का क्या, जो खैर याद ही तो है।। हर वक्त करवट जागीर को सुस्ताना ही पड़ेगा। उस दरख्त का क्या कुसूर जो शहतीर ही तो है।। अश्क-ए-दरिया को क्या आज बहे चाहे कल। वरना नमकीन पानी में क्या दर्द ही तो है।। इन चश्मों से निकलती आग को ज़रा थाम लेना। वरना दोज़ख़ भी मतलब से पाक ही तो है।। कंधों पे झुके हो कहीं हिल ना पड़ना। इस नामाकूल वजन का क्या बोझ ही तो है।। नज़्मों से मिले सुकूं तो ज़रा पंख बोना। अजी इस चाहत का क्या साख ही तो है।। हाथ मिलाना, गले मिलना और गर्मजोशी। बीमार इज़्ज़त का क्या नब्ज़ ही तो है।। दुआओं में बसेंगे लोग चाहने वालों के। अदायगी जिस्म का क्या खाक-राख ही तो है।।