ये घृणा का स्पंदन है, ये आक्रोश से वंदन है। इसे बस नमक-आप मत समझना, ये अश्रु रक्त क्रंदन हैं। हम वर्ण से कृष्ण हैं हम काक हैं, तो हममें कुछ कोयलें भी हैं। अज्ञानता के दिन और थे, लेकिन आज हम अभिमानी हैं। ये घृणा का स्पंदन है... ज़हर की तरह बात फ़ैल चुकी है बदन में, आजकल में अण्डे तोड़ने आयेंगी कोयलें। सलाखें गर्म हैं ध्यान रखियेगा बात को, क्या गलत होगा कहना कि पार हो जायेंगी साख में। ये आक्रोश से वंदन है... शतब्दियों से कटी-लटकी गर्दनें, विषसम स्वेदपूरित व्यभिचार। समस्त घिनौने अत्यापापाचार, हैं हमारी नाक पे बेखटके-अटके। इसे बस नमक-आप मत समझना, ये अश्रु रक्त क्रंदन हैं... गर आप सोचते हैं, सब माफ़ हो चुके हैं। तो कह भी दीजिये विश्वगुरु के पास नया बहाना है, आखिर हर किसी को एक दिन आना जाना है। नहीं है जवाब कोई तो कोई शिकवा नहीं, पर अब ये भी याद रख लीजियेगा! आशिकी, हलाली और रुदाली गई तेल लेने। आगे आग का दरिया है, एक-एक को डूब के जाना है। ये घृणा का स्पंदन है, ये आक्रोश से वंदन है... इसे बस नमक-आप मत समझना, ये अश्रु रक्त क्रंदन हैं... ...