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कठघरा

मंदिर किन्हीं ख़ास अभिजात्य वर्ग के लिए तब भी ऐशगाह थे, आज भी हैं और हमेशा रहेंगे और रहेंगे, रहेंगे तब तलक! जब तलक किसी किसी भी मूर्त्ति को वहाँ से जाता नहीं निकाला, किया जाता कठघरे में खड़ा और जाता पूछा, बताओ हर ऐश के हिस्से में तुम्हारा क्या किस्सा है, और इस किस्से के कितने हिस्से में झूमा कौन सा फलक? पर कठघरे में खड़ा किया जाना ज़्यादा  ज़रूरी है|

साये में

तुम रेत के वीरान दरम्याँ निकली नदी सी हो। इसराफ़ १   खुर्द २ ख्वाहिशों पे तक़रीबन नबी ३ सी हो।। वक्त को भी सब खबर है , वक्त का ही तो असर है। सज़दे में तिरे सिर झुकाये हमको तेरी किस कदर है। नाज़िम ४ बन बैठे है दुश्मन ,  नाज़िर ५ बने हुये हैं दोस्त। खुसफ़ुसाते हैं कान में , जो तबियत ज़रा वहमी सी हो।। तेरे कंधे , तेरी गर्दन पे अड़े वो खुदरे ६ खुरदुराते निशान। साझा सवाल हैं , जाहिर   जवाब ,  हैं   या खुद खालिस बयान। गर नज़र होती आज भी तो बहल जाता मेरा मन। पर बारिशों से पूछुँ अब , क्या मेरी गलतफ़हमी सी हो॥ कशसफ़े ७   पे   तुझे याद रखना   मेरी आदत बन चुकी। अब तबियत मेरी तबियत तेरी , ताउम्र आई ढल चुकी। हर्फ़ ८ , किस्सों में बदलने चला खुदको कुछ यूँ आज अब। तीरगी ९   के अक्स मानो तुम खुद खुशफ़हमी सी हो।। तुम रेत के वीरान दरम्याँ निकली नदी सी हो। इसराफ़   खुर्द ख्वाहिशों...

बस आजकल!

कई धड़ों में बंटा है कवि आजकल! कुछ का राम कुछ का रावण तो कुछ शंबूक खासकर! सभी की अपनी उम्मीदें और सब के खास शिकार और व्यापार। कहीं बिछे पुल तारीफ़ों के कहीं आगज़नी, दुत्कार, धिक्कार, तिरस्कार। राम आये सुख-दुःख बांटने। रावण भी आये सुख का आश्वासन देने। दोनों में अब कुछ खास विरोधाभास नहीं है। तब से नाहक का बंटवारे और आश्वासन पर, विश्वास नहीं है। क्यूँकि राम के पास सुख का बंटवारा नहीं है। और रावण के पास देने को बस उम्मीद है। यहाँ घोर काल में इसीलिए नाहक खास मुरीद हैं। कई धड़ों में बंटा है कवि आजकल। क्यूँकि मुंह तो किसी के पास, है ही नहीं आजकल! : © "Ankush Arya", 2017

क्षुधा से क्षुब्ध

आहार की तलाश वा शिकार भात मनुष्य अथवा सभी जानवरों के लिये, क्या सामुदयिकता का समारोह है? या यह वह प्रसाद है, जिसे वह सप्रेम अधिकार ग्रहण करता है। यापन रूपी जीवन के लिये,             वा जीवन स्थित यापन के लिये? निश्चय ही सप्रेम संधि है             जिसमें आवरण उच्छेद भी उतना आवश्यक है जितना             परिच्छेद कथा के लिये। मानव ऐन्द्रिय रूप से सामुदायिक है, या इन्द्रियों के लिये सामुदायिक है? ये अनिवार्य क्षुब्ध प्रश्न है क्षुधा से! आहार के लिये विचार के  लिये। : © "Ankush Arya", 2017

अक्सर हादसे ही हुआ करते

दु:ख देने वालों की आँखों से,             आँसू नहीं चुआ करते। राजनीति में क्यूँकि अक्सर,             हादसे नहीं हुआ करते॥ जो छिटपुट-छिटपुट बातों में,             बातों के तीर चलाते हैं। उनके ही दामन में अक्सर,             घनघोर घाव हुआ करते॥ राजनीति में क्यूँकि अक्सर... मेहनतकश परिवार को जो,             जातिगत बतलाते हैं। विद्या के अधिकार को जो,             नीच बोल धकियाते हैं। उनके ही घुटनों पर अक्सर,             ज़ालिम दर्द हुआ करते॥ राजनीति में क्यूँकि अक्सर... वारदात करने पर जो,        ...

ज़िद है क्या

जब शम्मां परवाने को बेक़रार हो जाये। जब हुक्काम तलबगार-ए-हुजूम हो जायें। तब दीठों से अपने धुँग़र्द फ़ाँक लेना। पंजो से अपने कानों को ढाँप लेना॥ जो आयें स्यार गली में तो बाँधकर, कभी ज़िबा तो कभी हाथ काट लेना॥ जब हुक्काम तलबगार-ए-हुजूम हो जायें... जो अश्क़ गर गुड़ लगने लगेंगे। चींटे मुंतज़िम मौत के होने लगेंगे॥ हो सके अगर आँखों को कील देना, वरना मुंतकिल होने में ज़माने लगेंगे॥ जब शम्मां परवाने को बेक़रार हो जाये... सर्राफ़ हो क्या जो क़ीमत बता दोगे? एहतियातन रसोई में गहने छुपा लोगे? दस्ताने ध्यान रखना, कंगन हों पहने, वरना बताओ कैसे नये पंजे बना लोगे? जब शम्मां परवाने को बेक़रार हो जाये... जब हुक्काम तलबगार-ए-हुजूम हो जायें... : © "Ankush Arya", 2017

नाक बीच में है

लोग ही कहते हैं अक्सर,             सेहत बहुत ज़रूरी है। हाथों में पड़ते छालों की,             मेहनत बहुत ज़रूरी है। ख्वाबों को जीते जाने में,             हरकत बहुत ज़रूरी है। कहाँ हैं अज़ीम नसीहत वाले,             गये कहाँ गुलकंदी वाले। नाक नापने ताज़ आँकने,             गये कहाँ घर के घरवाले? कौन खा गया सारी कतली,             कौन खा रहा राख-रोटी? आँख लग आयी हैं अबकी             सबकी नुचेंगी बोटी-बोटी। कुत्तों को ढोने वाले,             रखवाले भी ज़रूरी हैं? हाथ जोड़कर पड़ने वाले ...

घृणा! आक्रोश! अश्रु!

ये घृणा का स्पंदन है, ये आक्रोश से वंदन है। इसे बस नमक-आप मत समझना, ये अश्रु रक्त क्रंदन हैं। हम वर्ण से कृष्ण हैं हम काक हैं, तो हममें कुछ कोयलें भी हैं। अज्ञानता के दिन और थे, लेकिन आज हम अभिमानी हैं। ये घृणा का स्पंदन है... ज़हर की तरह बात फ़ैल चुकी है बदन में, आजकल में अण्डे तोड़ने आयेंगी कोयलें। सलाखें गर्म हैं ध्यान रखियेगा बात को, क्या गलत होगा कहना कि पार हो जायेंगी साख में। ये आक्रोश से वंदन है... शतब्दियों से कटी-लटकी गर्दनें, विषसम स्वेदपूरित व्यभिचार। समस्त घिनौने अत्यापापाचार, हैं हमारी नाक पे बेखटके-अटके। इसे बस नमक-आप मत समझना, ये अश्रु रक्त क्रंदन हैं... गर आप सोचते हैं, सब माफ़ हो चुके हैं। तो कह भी दीजिये विश्वगुरु के पास नया बहाना है, आखिर हर किसी को एक दिन आना जाना है। नहीं है जवाब कोई तो कोई शिकवा नहीं, पर अब ये भी याद रख लीजियेगा! आशिकी, हलाली और रुदाली गई तेल लेने। आगे आग का दरिया है, एक-एक को डूब के जाना है। ये घृणा का स्पंदन है, ये आक्रोश से वंदन है... इसे बस नमक-आप मत समझना, ये अश्रु रक्त क्रंदन हैं... ...

हर दर्द का ज़मींदोज़ होना

ज़मींदोज़ हुई ज़मीं,        ज़मीं पर बने खेत,               खेतों पर बहती नदी,                      आब पर बसा वायुदाब। और सब पर मनुष्य का प्रताप। आग हवा जल जंगल ज़मीं। सब एक के ऊपर एक, और सब पर आदमी। सभी पर सभ्यता की लकीरें खींची सभी मिटीं। ना बची सभ्यता ना बचा आदमी । बचा या बचा क्या सवाल होगा, किसका बचाव होगा? गर कुछ बचा तो बस, आग हवा जल जंगल ज़मीं। ज़मींदोज़ हुई ज़मीं,        ज़मीं पर बने खेत,               खेतों पर बहती नदी,                      आब पर बसा वायुदाब।