ज़िद है क्या

जब शम्मां परवाने को बेक़रार हो जाये।
जब हुक्काम तलबगार-ए-हुजूम हो जायें।

तब दीठों से अपने धुँग़र्द फ़ाँक लेना।
पंजो से अपने कानों को ढाँप लेना॥
जो आयें स्यार गली में तो बाँधकर,
कभी ज़िबा तो कभी हाथ काट लेना॥
जब हुक्काम तलबगार-ए-हुजूम हो जायें...

जो अश्क़ गर गुड़ लगने लगेंगे।
चींटे मुंतज़िम मौत के होने लगेंगे॥
हो सके अगर आँखों को कील देना,
वरना मुंतकिल होने में ज़माने लगेंगे॥
जब शम्मां परवाने को बेक़रार हो जाये...

सर्राफ़ हो क्या जो क़ीमत बता दोगे?
एहतियातन रसोई में गहने छुपा लोगे?
दस्ताने ध्यान रखना, कंगन हों पहने,
वरना बताओ कैसे नये पंजे बना लोगे?
जब शम्मां परवाने को बेक़रार हो जाये...
जब हुक्काम तलबगार-ए-हुजूम हो जायें...

:© "Ankush Arya", 2017

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