प्रतीत युद्ध
युद्ध विवशताओं और
सम्भावनाओं की कुंजी है!
सतत-निरंतर वैचारिक
विदीर्णता रूपी पूंजी है!
कमरबंध पे जमधर
कसलो हाथों में तलवार।
मातृभूमि की रक्षा
खातिर हो जाने दो
यलगार।
युद्ध विवशताओं और
लगातार अब चलने दो,
तलवारों पे तलवार।
अभी जीत बहुत हैं,
हार बहुत हैं
पर नहीं कहीं भी
सम्पूर्ण श्रांति
लेकिन फ़िर भी हो जाने दो
यलगारों पे यलगार।
सतत-निरंतर वैचारिक
विदीर्णता रूपी पूंजी है!
जीत के पीछे हार के आगे,
बिछी बहुत हैं लाश।
संधि का भी मूल्य होता
लाशें कहतीं काश!
युद्ध विवशताओं और
सम्भावनाओं की कुंजी है!
सतत-निरंतर वैचारिक
विदीर्णता रूपी पूंजी है!
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