ये बेनज़ीर*-बेवजह, तुम नज़रों को उठाये। अनकही-कहीं ताके-बताके जाये जा रहे हो।। उन तारों को, ना दूरबीन ना दूरंदीद के। बेहया-बेहिचक लगार * -वार सताये जा रहे हो।। गाँव की ज़मीनों पे, ना रखो करम-नज़रें। सियासी ज़मीन पे आस अड़ाये जा रहे हो।। ये सर्रर्रर्र सी आवाज़, मदहोशी का आलम। *ब ताशों पे क्यूँ नज़रबाज़ गड़ाये जा रहे हो।। कुछ खास हो गर तो पैबस्त* कर लो नफ़्स* में। क्यूँ रेज़े-रेज़े* पे हाईलाईटर घुमाये जा रहे हो।। इन बेरौनक हवाओं में, पैरहन* से दुश्मनी। फ़िर क्यूँ सर्दी में शिकायत जमाये जा रहे हो ।। *बेनज़ीर- बिना किसी नज़रिये के, *लगार- क्रम, सिलसिला *ब- कुशलतापूर्वक, *पैबस्त- कसकर समेट लेना, *नफ़्स- आत्मा, *रेज़े- (बहुवचन) रेज़ा, छोटी से छोटी चीज़, *पैरहन- पहना जाने वाला लंबा सा कोट। : © "Ankush Arya", 2017