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Showing posts with the label जिस्म-जिस्म की बात

क्षुधा से क्षुब्ध

आहार की तलाश वा शिकार भात मनुष्य अथवा सभी जानवरों के लिये, क्या सामुदयिकता का समारोह है? या यह वह प्रसाद है, जिसे वह सप्रेम अधिकार ग्रहण करता है। यापन रूपी जीवन के लिये,             वा जीवन स्थित यापन के लिये? निश्चय ही सप्रेम संधि है             जिसमें आवरण उच्छेद भी उतना आवश्यक है जितना             परिच्छेद कथा के लिये। मानव ऐन्द्रिय रूप से सामुदायिक है, या इन्द्रियों के लिये सामुदायिक है? ये अनिवार्य क्षुब्ध प्रश्न है क्षुधा से! आहार के लिये विचार के  लिये। : © "Ankush Arya", 2017

कड़वा लगा ना!

देख रही हूँ बहुत देर से  हद  गंदे से घूरते ही हुए,  कुछ परेशान हो? अरे दोस्ती के पीछे ही पड़े हो बिना जान-पहचान के,  समझो, अंजान हो! तुम तो पीछा कर-करके गली तक भी आ गये,  कहो श्वान् हो? इंसानियत की खातिर वर्चुअली पीछा छोड़ो,  मर्ज़ इंसान हो! कैसे हुई हिम्मत जो अचानक हाथ लगाने लगे,  नालायक! हैवान! हो।। अरे कैसे घूम रहे हो गोल-गोल पिट-पिटकर,  अरे! खेतान हो? साहब मिलने आईं हैं कोई बच्चियां आपसे,  कोई पहचान हो? काफ़ी मशहूर लग रहे हैं आप कारागार में,  लगता है शान हो? : © "Ankush Arya", 2017

हो जाने दो

आग को माकूल तपन पर छोड़ दो। इश्क-ए-अर्ज़ चुभन पे मोड़ दो।। तबियत भी खुश्क़ होगी तो क्या होगा, पैमाना दर्ज़ करेगा पोथी तो भी क्या होगा, हासिल ना हासिल से बढ़िया क्या होगा, जो काफ़िर को हुस्न से जोड़ दो। इश्क-ए-अर्ज़ चुभन पे मोड़ दो... इश्क के किवाड़ों पे खुदाई पली-बढ़ी मौसिक़ी इश्क से लाख बेहतर भली तंज़ हों पर चाहिये कर्ज़ ज़िंदादिली जो दो जार तार गर जोड़  दो। आग को माकूल तपन पर छोड़ दो... तमाखू की गढ़ में धँसी हथेलियाँ, काबिल-ए-तारीफ़ पहेलियाँ अठखेलियाँ, नाम जोड़ने वाले सारे सखा-सहेलियाँ, जो सासों में ईमान ओढ़ लो। आग को माकूल तपन पर छोड़ दो... इश्क-ए-अर्ज़ चुभन पे मोड़ दो... : © "Ankush Arya", 2017

उधड़ी मानसिकता

घर में चल रही कम्बल चर्चा पर , बच्चे ने पूछा अमुक अंकल , आपका क्या मंतव्य हो सकता है! बलात्कारी के बलात्करण पर , और बलात्कृत के बलात्कार पर । थोड़ा खोले और अधमुंदी आँखों से बोले , बेटा अभी क्यूँ है ये ज़रूरी , जो बात हो सके ना पूरी... घर में चल रही कम्बल चर्चा पर... इक घुप्पी के बाद बच्चे ने पूछा फ़िर से वैचारिक समन्वय पर दृष्टि पाने हेतु , क्यूँ ज़रूरी है अंधेरा साँकल के सुस्ताने  को ? क्यूँ पड़ी हैं कच्ची बेड़ियाँ सूरज के माथे को ? क्यूँ गलती पे होता है छिपना पीछे पछताने को ? बताइये ना कहाँ छोड़ते कहाँ जकड़ते ये काले मटियाले सेतु ? आपका क्या मंतव्य हो सकता है... मानो नमक मली हुई हथेलियाँ किसी ने आँखों पे रगड़ी हों , माननीय की साँस सी उखड़ी मानो नस कसकर पकड़ी हो। बच्चे ने पूछा  अमुक  अंकल... पहली बार अंधेरा इस घर से सन्नाटा ला रहा था। वरना चुप्पी का बाल भी बाँका ये घर कर पा रहा था! घर में चल रही कम्बल चर्चा पर... इस मौन में सब कुछ पसरा था , संवेदनायें ...