नाक बीच में है

लोग ही कहते हैं अक्सर,
            सेहत बहुत ज़रूरी है।
हाथों में पड़ते छालों की,
            मेहनत बहुत ज़रूरी है।
ख्वाबों को जीते जाने में,
            हरकत बहुत ज़रूरी है।

कहाँ हैं अज़ीम नसीहत वाले,
            गये कहाँ गुलकंदी वाले।
नाक नापने ताज़ आँकने,
            गये कहाँ घर के घरवाले?

कौन खा गया सारी कतली,
            कौन खा रहा राख-रोटी?
आँख लग आयी हैं अबकी
            सबकी नुचेंगी बोटी-बोटी।

कुत्तों को ढोने वाले,
            रखवाले भी ज़रूरी हैं?
हाथ जोड़कर पड़ने वाले
            क्या छाले भी ज़रूरी हैं?
या ऐसे लोगो की बातें,
            बातें नहीं मजबूरी हैं!

आखों की बारीकी पे भी, नाक बहुत ज़रूरी है।
बातों ही बातों आखिर, तांक-झांक बहुत ज़रूरी है।

:© "Ankush Arya", 2017

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