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फ़र्क पड़ेगा क्या?

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तुम हँस पड़े हो जो, अपने दायरों और दायित्वों से बाहर आके। बदलना-निगलना चाह रहे हो, अपने खाके और खाके पर खाके। ये जो गर्मजोशी तुमने तमाम नज़र, ज़मीन और बदन पर लिपटाई हुई है। आज वो इस कदर तुमसे चिपकी है, मानो वो 'की' नहीं है, 'काई' हुई है। ये सफर नम्र-विनम्र दास्तानों से शुरु होकर ख़त्म अब ख़त्म होने पर ही होगा। जिस भी क़िताब से पन्ना फटा था या फाड़ा, उस आधार पर नया अध्याय होगा। आरज़ू और जुस्तजू के जंगलों को इकतरफा​ ज़िक्र में भी बर्फ देना अब। ओरों-पोरों के जलों को तारीफ-ए-शबनम पर भी नमी की ज़मीं देना अब। किस्से-कहानियों की नुमाइश में कुचलों-पिछड़ों​ के सबको जगह मिलेगी। तुम जन्म कुंडली बांचो या बांटो भविष्य के पर्चे, ख़बर ज़रूर मिलेगी तुमको ख़बर ज़रूर मिलेगी। : © "Ankush Arya", 2017

उसूल है तो संदूक है

ये बेनज़ीर*-बेवजह, तुम नज़रों को उठाये।         अनकही-कहीं ताके-बताके जाये जा रहे हो।। उन तारों को, ना दूरबीन ना दूरंदीद के।         बेहया-बेहिचक लगार * -वार सताये जा रहे हो।। गाँव की ज़मीनों पे, ना रखो करम-नज़रें।         सियासी ज़मीन पे आस अड़ाये जा रहे हो।। ये सर्रर्रर्र सी आवाज़, मदहोशी का आलम।         *ब ताशों पे क्यूँ नज़रबाज़ गड़ाये जा रहे हो।। कुछ खास हो  गर तो  पैबस्त* कर लो नफ़्स* में।         क्यूँ रेज़े-रेज़े* पे हाईलाईटर घुमाये जा रहे हो।। इन बेरौनक हवाओं में, पैरहन* से दुश्मनी।         फ़िर क्यूँ सर्दी में शिकायत जमाये जा रहे हो ।। *बेनज़ीर- बिना किसी नज़रिये के, *लगार- क्रम, सिलसिला *ब- कुशलतापूर्वक, *पैबस्त- कसकर समेट लेना, *नफ़्स- आत्मा, *रेज़े- (बहुवचन) रेज़ा, छोटी से छोटी चीज़, *पैरहन- पहना जाने वाला लंबा सा कोट। : © "Ankush Arya", 2017

अक्सर हादसे ही हुआ करते

दु:ख देने वालों की आँखों से,             आँसू नहीं चुआ करते। राजनीति में क्यूँकि अक्सर,             हादसे नहीं हुआ करते॥ जो छिटपुट-छिटपुट बातों में,             बातों के तीर चलाते हैं। उनके ही दामन में अक्सर,             घनघोर घाव हुआ करते॥ राजनीति में क्यूँकि अक्सर... मेहनतकश परिवार को जो,             जातिगत बतलाते हैं। विद्या के अधिकार को जो,             नीच बोल धकियाते हैं। उनके ही घुटनों पर अक्सर,             ज़ालिम दर्द हुआ करते॥ राजनीति में क्यूँकि अक्सर... वारदात करने पर जो,        ...

ज़िद है क्या

जब शम्मां परवाने को बेक़रार हो जाये। जब हुक्काम तलबगार-ए-हुजूम हो जायें। तब दीठों से अपने धुँग़र्द फ़ाँक लेना। पंजो से अपने कानों को ढाँप लेना॥ जो आयें स्यार गली में तो बाँधकर, कभी ज़िबा तो कभी हाथ काट लेना॥ जब हुक्काम तलबगार-ए-हुजूम हो जायें... जो अश्क़ गर गुड़ लगने लगेंगे। चींटे मुंतज़िम मौत के होने लगेंगे॥ हो सके अगर आँखों को कील देना, वरना मुंतकिल होने में ज़माने लगेंगे॥ जब शम्मां परवाने को बेक़रार हो जाये... सर्राफ़ हो क्या जो क़ीमत बता दोगे? एहतियातन रसोई में गहने छुपा लोगे? दस्ताने ध्यान रखना, कंगन हों पहने, वरना बताओ कैसे नये पंजे बना लोगे? जब शम्मां परवाने को बेक़रार हो जाये... जब हुक्काम तलबगार-ए-हुजूम हो जायें... : © "Ankush Arya", 2017

नाक बीच में है

लोग ही कहते हैं अक्सर,             सेहत बहुत ज़रूरी है। हाथों में पड़ते छालों की,             मेहनत बहुत ज़रूरी है। ख्वाबों को जीते जाने में,             हरकत बहुत ज़रूरी है। कहाँ हैं अज़ीम नसीहत वाले,             गये कहाँ गुलकंदी वाले। नाक नापने ताज़ आँकने,             गये कहाँ घर के घरवाले? कौन खा गया सारी कतली,             कौन खा रहा राख-रोटी? आँख लग आयी हैं अबकी             सबकी नुचेंगी बोटी-बोटी। कुत्तों को ढोने वाले,             रखवाले भी ज़रूरी हैं? हाथ जोड़कर पड़ने वाले ...