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ज़िद है क्या

जब शम्मां परवाने को बेक़रार हो जाये। जब हुक्काम तलबगार-ए-हुजूम हो जायें। तब दीठों से अपने धुँग़र्द फ़ाँक लेना। पंजो से अपने कानों को ढाँप लेना॥ जो आयें स्यार गली में तो बाँधकर, कभी ज़िबा तो कभी हाथ काट लेना॥ जब हुक्काम तलबगार-ए-हुजूम हो जायें... जो अश्क़ गर गुड़ लगने लगेंगे। चींटे मुंतज़िम मौत के होने लगेंगे॥ हो सके अगर आँखों को कील देना, वरना मुंतकिल होने में ज़माने लगेंगे॥ जब शम्मां परवाने को बेक़रार हो जाये... सर्राफ़ हो क्या जो क़ीमत बता दोगे? एहतियातन रसोई में गहने छुपा लोगे? दस्ताने ध्यान रखना, कंगन हों पहने, वरना बताओ कैसे नये पंजे बना लोगे? जब शम्मां परवाने को बेक़रार हो जाये... जब हुक्काम तलबगार-ए-हुजूम हो जायें... : © "Ankush Arya", 2017

नाक बीच में है

लोग ही कहते हैं अक्सर,             सेहत बहुत ज़रूरी है। हाथों में पड़ते छालों की,             मेहनत बहुत ज़रूरी है। ख्वाबों को जीते जाने में,             हरकत बहुत ज़रूरी है। कहाँ हैं अज़ीम नसीहत वाले,             गये कहाँ गुलकंदी वाले। नाक नापने ताज़ आँकने,             गये कहाँ घर के घरवाले? कौन खा गया सारी कतली,             कौन खा रहा राख-रोटी? आँख लग आयी हैं अबकी             सबकी नुचेंगी बोटी-बोटी। कुत्तों को ढोने वाले,             रखवाले भी ज़रूरी हैं? हाथ जोड़कर पड़ने वाले ...