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फ़र्क पड़ेगा क्या?

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तुम हँस पड़े हो जो, अपने दायरों और दायित्वों से बाहर आके। बदलना-निगलना चाह रहे हो, अपने खाके और खाके पर खाके। ये जो गर्मजोशी तुमने तमाम नज़र, ज़मीन और बदन पर लिपटाई हुई है। आज वो इस कदर तुमसे चिपकी है, मानो वो 'की' नहीं है, 'काई' हुई है। ये सफर नम्र-विनम्र दास्तानों से शुरु होकर ख़त्म अब ख़त्म होने पर ही होगा। जिस भी क़िताब से पन्ना फटा था या फाड़ा, उस आधार पर नया अध्याय होगा। आरज़ू और जुस्तजू के जंगलों को इकतरफा​ ज़िक्र में भी बर्फ देना अब। ओरों-पोरों के जलों को तारीफ-ए-शबनम पर भी नमी की ज़मीं देना अब। किस्से-कहानियों की नुमाइश में कुचलों-पिछड़ों​ के सबको जगह मिलेगी। तुम जन्म कुंडली बांचो या बांटो भविष्य के पर्चे, ख़बर ज़रूर मिलेगी तुमको ख़बर ज़रूर मिलेगी। : © "Ankush Arya", 2017

घृणा! आक्रोश! अश्रु!

ये घृणा का स्पंदन है, ये आक्रोश से वंदन है। इसे बस नमक-आप मत समझना, ये अश्रु रक्त क्रंदन हैं। हम वर्ण से कृष्ण हैं हम काक हैं, तो हममें कुछ कोयलें भी हैं। अज्ञानता के दिन और थे, लेकिन आज हम अभिमानी हैं। ये घृणा का स्पंदन है... ज़हर की तरह बात फ़ैल चुकी है बदन में, आजकल में अण्डे तोड़ने आयेंगी कोयलें। सलाखें गर्म हैं ध्यान रखियेगा बात को, क्या गलत होगा कहना कि पार हो जायेंगी साख में। ये आक्रोश से वंदन है... शतब्दियों से कटी-लटकी गर्दनें, विषसम स्वेदपूरित व्यभिचार। समस्त घिनौने अत्यापापाचार, हैं हमारी नाक पे बेखटके-अटके। इसे बस नमक-आप मत समझना, ये अश्रु रक्त क्रंदन हैं... गर आप सोचते हैं, सब माफ़ हो चुके हैं। तो कह भी दीजिये विश्वगुरु के पास नया बहाना है, आखिर हर किसी को एक दिन आना जाना है। नहीं है जवाब कोई तो कोई शिकवा नहीं, पर अब ये भी याद रख लीजियेगा! आशिकी, हलाली और रुदाली गई तेल लेने। आगे आग का दरिया है, एक-एक को डूब के जाना है। ये घृणा का स्पंदन है, ये आक्रोश से वंदन है... इसे बस नमक-आप मत समझना, ये अश्रु रक्त क्रंदन हैं... ...