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विहंगम विश्वास

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ये पथरीले-रेतीले जंगल , ये ज़िंदा सांस लेते सागर-महासागर | हाँ ये वही बासी बहती हवा पे ताज़ी गुनगुनाती धूप | सब तेरे लिए है और उन सबके लिए जो  तेरे लिए हैं | इस डिब्बे में बंद सारी मिश्री सी यादें और मिश्री पे बैठी वो काली सी चींटी जिसके पंख भी कनक से सजे हैं वो अभी  खनककर उड़ी है और बैठी है उस घड़ी  पे जो तेरे स्वेद-श्रम-सम मोतियों से सजी है| और उसकी टिकटिक से आवाज़ इतनी ऊंची कि मुड़के लोग पूछेंगे ये घड़ी-अड़ी  किसलिये है| कहना कुछ भी तुम्हारा कभी नहीं होगा काफी मेरी ज़मीं इसलिए है मेरा आसमां उसलिए है | जोड़ना पड़ेगा पंखों से पीर  को और बनना पड़ेगा खुदसा 'नज़ीर' को वरना ये विहंगम विश्वास किसलिए है? १. कनक    -       Gold २. स्वेद      -       Sweat ३. पीर        -      Agony + Faqir ४. नज़ीर    -       Perfect Example ५. विहंगम -       Huge : © "Ankush Arya", 2017 ...

उधड़ी मानसिकता

घर में चल रही कम्बल चर्चा पर , बच्चे ने पूछा अमुक अंकल , आपका क्या मंतव्य हो सकता है! बलात्कारी के बलात्करण पर , और बलात्कृत के बलात्कार पर । थोड़ा खोले और अधमुंदी आँखों से बोले , बेटा अभी क्यूँ है ये ज़रूरी , जो बात हो सके ना पूरी... घर में चल रही कम्बल चर्चा पर... इक घुप्पी के बाद बच्चे ने पूछा फ़िर से वैचारिक समन्वय पर दृष्टि पाने हेतु , क्यूँ ज़रूरी है अंधेरा साँकल के सुस्ताने  को ? क्यूँ पड़ी हैं कच्ची बेड़ियाँ सूरज के माथे को ? क्यूँ गलती पे होता है छिपना पीछे पछताने को ? बताइये ना कहाँ छोड़ते कहाँ जकड़ते ये काले मटियाले सेतु ? आपका क्या मंतव्य हो सकता है... मानो नमक मली हुई हथेलियाँ किसी ने आँखों पे रगड़ी हों , माननीय की साँस सी उखड़ी मानो नस कसकर पकड़ी हो। बच्चे ने पूछा  अमुक  अंकल... पहली बार अंधेरा इस घर से सन्नाटा ला रहा था। वरना चुप्पी का बाल भी बाँका ये घर कर पा रहा था! घर में चल रही कम्बल चर्चा पर... इस मौन में सब कुछ पसरा था , संवेदनायें ...