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जो भी समझो!

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ऐसा मैं क्या लिख दूँ अब! इक सम्यक सा झूठ लिखूँ या कहूँ तिलमिलाया सच, अपनी तीखी जुबां घोल दूँ या पीलूँ मैं अब आहें सब, तेरी तारीफों पे तारीफें कर दूँ या करुँ मन खुरदुरा अब, तेरा सवाल मेरा जवाब या मेरे सवाल तेरे जवाब, तरन्नुम पे हालात लिख दूँ या ज़हर भरे से कड़वे शब्द, बेगानी बातें सब लिख दूँ या लिख दूँ दिल की हालत अब! मेरा कहा अपना अनकहा जो भी तूने झेला होगा! तेरा भी कुछ बयान होगा जो कुछ तूने ठेला होगा! मैंने तुझसे तूने मुझसे जो कुछ थोड़ा खेला होगा! ख़ास खराबी होंगी मुझमें पर थोड़ी-थोड़ी सबमें  होंगी, कहना जो कुछ होगी शिकवा जिनसे भी मन दहला होगा! तेरी आँखें  पत्थर हो जब नाम कुरेदना मेरा तब| नहीं मिटेगा अमिट रहेगा मेहंदी-रोली टीका रब| हाथ सभी हों जब गज-बज घर-भर को सजाना तब| अमर रहेंगे अजर कहेंगे शीशा-तुलसी दर पे सब| ऐसा मैं क्या लिख दूँ  अब! सम्यक                       =                        ...

यही धोखा है

उनकी आँखें सवेरा थी किसी का। टूटी इमारतें बसेरा थीं किसी का॥ परछाइयों के पीछे छिप गयी हैं वो। जो कभी आँखें पहरा थीं किसी का॥ वक्त को थामकर जाना था जिन्हें आगे। काल के गाल में चेहरा छुपा है उन्हीं का॥ गलती का मतला ही पता ना था जिनको। हार का कहर अब उन्हें पता है कभी का॥ दरम्याँ ही चलना जो समझते थे मुनासिब। खाक और राख में वक्त ठहरा उन्हीं का॥ आलीशान थे जिनके कभी महलों के ख्वाब। अब कहाँ वो मज़ार नाम तो लो सरज़मीं का॥ कुदरत के बंदे हो फ़ितरत से मिल लेना। नज़ीर ख्वाबों का क्या चांद ठहरा किसी का॥