हो जाने दो
आग को माकूल
तपन पर छोड़ दो।
इश्क-ए-अर्ज़
चुभन पे मोड़ दो।।
तबियत भी
खुश्क़ होगी तो क्या होगा,
पैमाना दर्ज़
करेगा पोथी तो भी क्या होगा,
हासिल ना
हासिल से बढ़िया क्या होगा,
जो काफ़िर को
हुस्न से जोड़ दो।
इश्क-ए-अर्ज़
चुभन पे मोड़ दो...
इश्क के
किवाड़ों पे खुदाई पली-बढ़ी
मौसिक़ी इश्क
से लाख बेहतर भली
तंज़ हों पर
चाहिये कर्ज़ ज़िंदादिली
जो दो जार तार
गर जोड़ दो।
आग को माकूल
तपन पर छोड़ दो...
तमाखू की गढ़
में धँसी हथेलियाँ,
काबिल-ए-तारीफ़
पहेलियाँ अठखेलियाँ,
नाम जोड़ने
वाले सारे सखा-सहेलियाँ,
जो सासों में
ईमान ओढ़ लो।
आग को माकूल
तपन पर छोड़ दो...
इश्क-ए-अर्ज़
चुभन पे मोड़ दो...
:© "Ankush Arya", 2017
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