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उसूल है तो संदूक है

ये बेनज़ीर*-बेवजह, तुम नज़रों को उठाये।         अनकही-कहीं ताके-बताके जाये जा रहे हो।। उन तारों को, ना दूरबीन ना दूरंदीद के।         बेहया-बेहिचक लगार * -वार सताये जा रहे हो।। गाँव की ज़मीनों पे, ना रखो करम-नज़रें।         सियासी ज़मीन पे आस अड़ाये जा रहे हो।। ये सर्रर्रर्र सी आवाज़, मदहोशी का आलम।         *ब ताशों पे क्यूँ नज़रबाज़ गड़ाये जा रहे हो।। कुछ खास हो  गर तो  पैबस्त* कर लो नफ़्स* में।         क्यूँ रेज़े-रेज़े* पे हाईलाईटर घुमाये जा रहे हो।। इन बेरौनक हवाओं में, पैरहन* से दुश्मनी।         फ़िर क्यूँ सर्दी में शिकायत जमाये जा रहे हो ।। *बेनज़ीर- बिना किसी नज़रिये के, *लगार- क्रम, सिलसिला *ब- कुशलतापूर्वक, *पैबस्त- कसकर समेट लेना, *नफ़्स- आत्मा, *रेज़े- (बहुवचन) रेज़ा, छोटी से छोटी चीज़, *पैरहन- पहना जाने वाला लंबा सा कोट। : © "Ankush Arya", 2017

हो जाने दो

आग को माकूल तपन पर छोड़ दो। इश्क-ए-अर्ज़ चुभन पे मोड़ दो।। तबियत भी खुश्क़ होगी तो क्या होगा, पैमाना दर्ज़ करेगा पोथी तो भी क्या होगा, हासिल ना हासिल से बढ़िया क्या होगा, जो काफ़िर को हुस्न से जोड़ दो। इश्क-ए-अर्ज़ चुभन पे मोड़ दो... इश्क के किवाड़ों पे खुदाई पली-बढ़ी मौसिक़ी इश्क से लाख बेहतर भली तंज़ हों पर चाहिये कर्ज़ ज़िंदादिली जो दो जार तार गर जोड़  दो। आग को माकूल तपन पर छोड़ दो... तमाखू की गढ़ में धँसी हथेलियाँ, काबिल-ए-तारीफ़ पहेलियाँ अठखेलियाँ, नाम जोड़ने वाले सारे सखा-सहेलियाँ, जो सासों में ईमान ओढ़ लो। आग को माकूल तपन पर छोड़ दो... इश्क-ए-अर्ज़ चुभन पे मोड़ दो... : © "Ankush Arya", 2017