फ़र्ज़ पूरा करो
वो गुब्बारे
बेचता लड़का, जो इन्सान लग रहा था।
आज लाल बत्ती
पर, आदमखोरों के पैरों पर,
गिड़गिड़ाकर
लेटने लगा, आदिम गुज़ारिश करने लगा।
मुनादी सी
करता, बार-बार था कहता।
दस का है एक
गुब्बारा, ओ साहिब! ओ साहिबा!
कुछ भला करदो
हमारा, फ़िर भला होगा तुम्हारा!
करो खूब जतन,
खूब फ़ख्र करो।
असर होता न देख ज़हर घोला-बोला,
इज़्ज़त करो
जमाखोरी को ना कहो।
आज रात को मदद से पेट हमारा भरदो।
गल-बहियाँ बैठी
आदमखोरनी, हिचकिचाई तमतमाई।
...खोर भी खिसियाया, और फ़िर तमतमाया।
फ़िर झेंपते
हुए उसने, ना को गर्दन से हाँ दिखाया!
बच्चा समझदार
था, या बहुत समझदार था,
इधर- उधर के इशारों में सब समझ गया।
बात ना यहाँ
की हुई ना वहाँ की,
मान लो ना किसी ने कुछ कभी कही,
ना ही किसी ने
कानोंकान कुछ सुनी।
खामोशी पसर
चुकी थी माहौल में,
बच्चा जाना नहीं चाहता, और खोर कुछ
देना।
आँखें गुम हो
रही थीं, आफ़ताब चुप था,
आखिरी मौके पे उसने आखिरी दाँव खेला।
माँ तुम
चाहोगी? बच्चा भूखा सो जाये?
या रात के किसी कोने में रोता-रोता सो
जाये....
:© "Ankush Arya", 2017
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