अरे साहित्य!
अरे साहित्य ये तेरे गर्भगृह का बेजान खज़ाना|
हरकतों से दलित और तारीफों पे राजपूताना||
परवरिश का ज़ोर है कोई सुनने का चोर है|
नीयत है बेसाहनी अब कहीं तौर कहीं टौर है||
किरमिचों की नुमाइश में फँसे बंदे और बंदियाँ|
बस यहाँ-वहाँ अदा-बदा का नया पुराना ज़ोर है||
रोज़ाना की अख़बार तकलीफें समेटे जिस्म में|
ख्वाहिशों पे नमक और ज़ुबाँ पे मीठा पुरज़ोर है||
डाइनिंग टेबल से उठी ज़ुबाँ किताबों पे खामोश अब|
ये जो ज्ञान है बोध है बस पल दो पल का जोश है|
तुम्हारे कान पे तारीफों से सिमटे हैं जो 'नाज़िर'|
सावधान अब तुम्हारी या उनकी कुंडली में दोष है|
:© "Ankush Arya", 2017
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