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अरे साहित्य!

अरे साहित्य ये तेरे गर्भगृह का बेजान खज़ाना| हरकतों से  दलित और तारीफों पे राजपूताना|| परवरिश का ज़ोर है कोई सुनने का चोर है| नीयत है बेसाहनी अब कहीं तौर कहीं टौर है|| किरमिचों की नुमाइश में फँसे बंदे और बंदियाँ| बस यहाँ-वहाँ अदा-बदा का नया पुराना ज़ोर है|| रोज़ाना की अख़बार तकलीफें समेटे जिस्म में| ख्वाहिशों पे नमक और ज़ुबाँ पे मीठा पुरज़ोर है|| डाइनिंग टेबल से उठी ज़ुबाँ किताबों पे खामोश अब| ये जो ज्ञान है बोध है बस पल दो पल का जोश है| तुम्हारे कान पे तारीफों से सिमटे हैं जो 'नाज़िर'| सावधान अब तुम्हारी या उनकी कुंडली में दोष है| : © "Ankush Arya", 2017

दंश का अंश

हवा में घुटी दबदबाती सी चीख को ,           उन तमाम दरख्तों पर उतारा। फ़िर लिखा मुझे चाहिये गालियाँ औ’           मुझे और तुम्हें बस इसी का सहारा॥ हुजूम नहीं लगा लिखने वालों का, इक्का-दुक्के आते थे, हवा में हाथ, हाथों में हवा, जादू की तरह फ़हराते थे| हवा में घुटी दबदबाती सी चीख को... सर्पंच ने अब गुप्तचर बांध लिये दुश्मन से बचने को, किसी को भी नहीं पता अब कौन-कौन है? सबका शक ही इक दूसरे पे क्यूँकि तहक़ीकात मौन है, फ़िर भी शाम को मुँह-अंधेरे की बात से चबूतरों पे, हुक्क़ों के साथ-साथ खाँसियों का हुजूम है, कुछ नई खाँसियाँ हैं, कुछ पुरानी तो कुछ मौत को आने वाली हैं, बाकी बचे तितर-बितर गुड़गुड़-खाँसी सुनने आ गये। फ़िर लिखा मुझे चाहिये गालियाँ औ’... हर हुक्के पे ढेरों फीक़ी हँसियाँ उकेरे,           सभी के फीक़ेपन को है इंतज़ार। कोई समधी कुछ तो कहे कुछ तरेरे,           कहाँ हैं नक्शेक...

क्षुधा से क्षुब्ध

आहार की तलाश वा शिकार भात मनुष्य अथवा सभी जानवरों के लिये, क्या सामुदयिकता का समारोह है? या यह वह प्रसाद है, जिसे वह सप्रेम अधिकार ग्रहण करता है। यापन रूपी जीवन के लिये,             वा जीवन स्थित यापन के लिये? निश्चय ही सप्रेम संधि है             जिसमें आवरण उच्छेद भी उतना आवश्यक है जितना             परिच्छेद कथा के लिये। मानव ऐन्द्रिय रूप से सामुदायिक है, या इन्द्रियों के लिये सामुदायिक है? ये अनिवार्य क्षुब्ध प्रश्न है क्षुधा से! आहार के लिये विचार के  लिये। : © "Ankush Arya", 2017