दंश का अंश

हवा में घुटी दबदबाती सी चीख को,
          उन तमाम दरख्तों पर उतारा।
फ़िर लिखा मुझे चाहिये गालियाँ औ’
          मुझे और तुम्हें बस इसी का सहारा॥

हुजूम नहीं लगा लिखने वालों का, इक्का-दुक्के आते थे,
हवा में हाथ, हाथों में हवा, जादू की तरह फ़हराते थे|
हवा में घुटी दबदबाती सी चीख को...

सर्पंच ने अब गुप्तचर बांध लिये दुश्मन से बचने को,
किसी को भी नहीं पता अब कौन-कौन है?
सबका शक ही इक दूसरे पे क्यूँकि तहक़ीकात मौन है,
फ़िर भी शाम को मुँह-अंधेरे की बात से चबूतरों पे,
हुक्क़ों के साथ-साथ खाँसियों का हुजूम है,
कुछ नई खाँसियाँ हैं, कुछ पुरानी तो कुछ मौत को आने वाली हैं,
बाकी बचे तितर-बितर गुड़गुड़-खाँसी सुनने आ गये।
फ़िर लिखा मुझे चाहिये गालियाँ औ’...


हर हुक्के पे ढेरों फीक़ी हँसियाँ उकेरे,
          सभी के फीक़ेपन को है इंतज़ार।
कोई समधी कुछ तो कहे कुछ तरेरे,
          कहाँ हैं नक्शेकदम धारदार चमकदार।
मुझे और तुम्हें बस इसी का सहारा...

हुक्कों में सुलगाहट सुगबुगाहट, रात के साथ बढ़ने लगी।
आखिर हुक्कों के हाथ में है हकूकों का कहर,
और दरख्तों की ईमानदार तबियत ढलने लगी।
उन तमाम दरख्तों पर उतारा...


कोई बड़ी ही बेअदबी से, तो कोई अदब से गाली दे रहा है,
माँ-बेटी-बहन, चाची-ताई-बुआ, मौसी-मामी बिना खामी,
सब ज़ुबानों में अपना रिश्ता आराम से जोड़ रहा है।
हवा में घुटी दबदबाती सी चीख को, उन तमाम दरख्तों पर उतारा...

इतने में जंगल फुसफुसाया-किसी को कुछ उकेरना है उकेर डालो...
(इतने में आ गयीं औरतें-बच्चियां कहने-पाजेब खुलने से पहले कि खाना खालो)
पर यकीन मानों पूरा गाँव इकट्ठा हो गया बस ये कहने,
कि इस बेतरतीब को गाँव-बिरादर से बाहर निकालो,
साथ ही दफ़ना दो उन स्मृतियों को,
जिनमें अपार दंशों का भय और दर्द है।
पाठकों से अनुरोध है इस कविता को पढ़ते ही भुला या जला डालो।

:© "Ankush Arya", 2017

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