तुम क्या चाहते हो

वो क्या है जो सिर में ज़हर सा बैठ गया है,
और गले का सहारा लेकर बाहर आना चाहता है,
और फ़िर खुद मेरे धड़ को कुचलने-निगलने लगा है,
मैं शिथिल हो रहा हूँ।
भावुक भी हूँ।
सोच रहा हूँ उगलूँ या निगलूँ?
निगलूँ तो नहीं रहूंगा।
और उगलूँ तो मैं, मैं नहीं रहूंगा

क्या यही जीवन यंत्र-मंत्र-तंत्र का अंतिम
संगीत है।
अत्यंत भद्दा और बेसुरा।
किनसे पैदा हुआ है?
या स्वयं उत्पत्ति का केंद्र है?

अरे! पहचाना तुम्हें, तुम वही हो ना जो मिर्च खाकर भी
हंसते हो।
अरे! तुम वहीं से हो ना जहाँ अक्ल-मंद लोग
बसते हैं।
अरे! तकियाह तो उतारो ज़रा हम भी तो देखें ऊपर से
गंजे हो।
अरे! ऐसे काम करते ही क्यूँ हो जिसपर सारे राज्य तुमपर
हँसते हैं।

कुटिल, निष्ठुर, कुरूप किन्तु हास्यास्पद...
पूर्वाग्रह! पूर्वाग्रह! ओह पूर्वाग्रह!
क्या इलाज करें तुम्हारा या तुम लाइलाज हो?
सवाल क्यूँ करा जाये तुमसे जब तुम खुद जवाब हो।
तुम छोड़ते हो मुझे खुद या मेरा आक्रोश तुम्हें पी ले॥
नियती नहीं हो तुम,
मेरा अज्ञान हो! अंधकार हो!
तुम्हारे खिलाफ़ है मेरा अब...
सत्याग्रह! सत्याग्रह! ओह सत्याग्रह!

अब कथानक सभी असमभावों, असामाजिक घृणा, कलंकार को
सिर ही में दबाये आँखें मूंदकर सो रहा है।

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