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शुक्रगुज़ार

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तुम्हें वक्त का ठहराव भी ठीक लगे और हो पसंद उसमें तुम्हें बदलाव, पर जो हो पसंदीदा उसमें सुलझा सा दांव । क्योंकि इतना शुक्रिया होना अभी है कम। तुम्हें स्वर्गीय सुख भी पसंद हो और नरक की भीड़ भी ठीक ठाक लगे, पर हो पसंदीदा उनमें कुदरत सा फैलाव । क्योंकि... तुम्हें इस्लामी अर्ज़ भी पसंद हो और हो पसंद सनातनी नमस्कार , पर जो हो पसंदीदा हो वो हिंदुस्तानी बर्ताव । क्योंकि... तुम्हें नगर की धूल भी ठीक लगे और पसंद आए नन्हें-नन्हें गांव भी, पर पसंदीदा हो उनमें इंसानी बदलाव । क्योंकि... तुम्हें राजनैतिक त्यौरियां भी पसंद हो और ठीक लगे फिल्मी टकराव , पर जो हो पसंदीदा हो वो नागरिकता का भाव । क्योंकि... तुम्हें बिसरे की याद भी सताए और भविष्य की उम्मीद भी पसंद हो, पर जो हो पसंदीदा हो नया सालाना ताव । क्योंकि इतना शुक्रिया होना अभी कम है। नववर्ष की शुभकामनाओं सहित। -©अंकुश कुमार

चिल्ल पौं की दुनिया

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मैंने अपनी आंखें हैं बंद कर लीं। और मैं हूं एक ऐसी दुनिया में। जिसे मैं चिल्ल पौं की दुनिया हूं कहता। यह दुनिया है वैसे बड़े रुखसत अंदाज में बनी। दुनिया में इस, शोर के अलावा होता है कुछ भी नहीं । हर आती-जाती आवाज होती है जानी पहचानी। लेकिन फिर भी किसी के लिए ठहरता कुछ भी नहीं। क्योंकि यह है एक ऐसी दुनिया... जिसे मैं चिल्ल पौं की दुनिया हूं कहता। मान लीजिए कहीं कभी किसी के लिए गलती से। या बिना गलती हुए कुछ थम जाए। तो समझ लेना आखिर में, यह कुछ नहीं थमा, बल्कि दुनिया थम जाए। क्योंकि यह दुनिया ही है ऐसी दुनिया... जिसे मैं चिल्ल पौं की दुनिया हूं कहता पर यह जो वक्त का कांटा है अभी अभी रूका। मुझे तो कुछ खास नहीं पर दुनिया को जरूर चुभा। क्योंकि वक्त पीछे जब नहीं है मुड़ सकता। फिर उसका शोर ही क्यों रुका भला। सुनलो अब यही है अजब गजब की दुनिया... जिसे मैं चिल्ल पौं की दुनिया हूं कहता।

दादाजी और धूप

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उम्र के इस पड़ाव पे, वक्त के इस घुमाव पे, दादाजी को धूप पसंद ठहरी| सवेरे अंधेरे उन्हें बिस्तर से निकलने में डर बहुत लगता है| लेकिन जाते ही ज़रा सी आंखों में, धूप नाम की चिंगारी, उठते हैं ऐसे, मानो स्वयं साक्षात अर्जुन से, कभी ना सोने की शिक्षा लेकर आये हैं, पर जगते ही निकल पड़ते हैं, दूर तलक, हाथ में बेंत और आँखों में धूप की उम्मीद लिये, जहाँ तलक हैं चल सकते, कदम ठिठकते-ठिठकते, मानो वो धूप नहीं ढूंढ रहे, ढूंढते हैं ज़िन्दगी को उम्र के इस पड़ाव पे, क्योंकि वक्त के इस घुमाव पे, पसंद दादाजी को धूप बहुत ठहरी|  पड़ते ही माथे पे किरण पहली,  गूंज उठे है किलकारी, जिसमें कोई  बूढ़ा नहीं, बच्चा है बैठा होता, ला मेरी कुर्सी दे,  ला मेरा अखबार दे, जब नहीं है पहुंचा पाता कोई,  तो आती हैं गूंजती हुई, आवाज़ें खरड़-खरड़, शायद हमारे घर में धूप,  बचपना लेकर आती है, दिन भर धूप में सुस्ताते हैं,  कभी हैं धीर गंभीर हो अखबार पढ़ते, कभी खाना धूप में ही मंगवाते हैं, लोग कहते है...

गुटर गूं

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किसने कहा मुझे गुटर गूं अच्छी है लगती। नहीं, ना मुझे गुटर गूं अच्छी है लगती! ना ही कबूतरों कि गर्दन में धंसे, वो चमकीले से पंख, जिसे दिखा दिखा के लोगों को बेवकूफ़ और कबूतर को ख़ूबसूरत बताया बनाया जाता है। ना ही कपोत को हवा में लहराया फहराया जाना बनाके जैसे कि मिसाल में हो शांति का दूत । क्यूंकि, जैसे ही, नज़र जाती है तरफ इनके नज़र आता है मुझे, अचानचक से! गौरैयाओं का बहुत दूर चले जाना और फिर मुड़के कभी वापिस ना आना समझदार लोग इसे गौरैया के लिए विनाश कागारी भी हैं बताते। लेकिन सच ये है... कि कबूतरों में मैंने अपना बचपन ख़त्म होते देखा है। © अंकुश कुमार

उम्मीद भी क्या ज़बरदस्त चीज़ है!

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जब कोई कर बैठता है उम्मीद, तब कुछ ज़्यादा ही आती है शरम, कभी उम्मीदों से कोई रूबरू होकर, कहीं कभी गलती से फोन पर। और शरम ऐसे नहीं आती, की मैं बस शरमा गया... ये आती है मानो कि सारे भरे बाज़ार, पड़े हों लठ्ठ कमर पर। क्योंकि सब इस उम्मीद को किसी का पुरजोर हमला मानो कैसे हो सकता है इस उम्मीद का डटकर सामना बस सोचते रह जाओ और सबसे ज़्यादा आती है तब जब मुझसे बड़े मुझे खुदसे बड़ा समझने लगते हैं। और कर बैठते हैं, बड़ी ही उम्मीदों से उम्मीद। तब ही बदलती है शरम खीझ में, जब आने आने लगता है अनोखा विचार कि तुम क्या क्या हो सकते थे, और क्या क्या कर सकते हो? फिर मिटाने को झेंप अपनी थमा देता हूं उन्हें कॉन्टेक्ट किसी का, जिसे मैं सीधे और व्यक्त शब्दों में कंसंर्न्ड पर्सन परिभाषित हूं करता। मैं जानता हूं जो ये मेरे गिने चुने दोस्त हैं, सब संभाल लेंगे, और अगर नहीं संभाल पाएंगे, तो उनका भी कोई कंसंर्न्ड पर्सन होगा ही। और इस तरह उम्मीदों की रखवाली के लिए बनती जाती है, कंसंर्न्ड लोगों की भौगोलिक और कभी ना खत्म होने वाली लड़ी, जिनमें खुद से उलझे लोग भी, कुछ देर के लिए सही ...

जज़्बात

नज़ीर पूछे जज़्बातों से बोलो तुम क्या कहते हो, जज़्बातों की वकील बानी ज़िबां, बोली ये कहाँ कुछ कहते हैं? ये तो बस ज़िंदा रहते हैं| इन्हें मरना आया ही नहीं, समय के साथ भीष्म मरे, बुद्ध मरे, मरे अनेक शरीर, राम मरे, कृष्ण मरे, रहे जज़्बात अधीर| ये तब भी थे, ये आज भी हैं, ये कल-परसों पे सवार और आगे भी रहेंगे, ये धृतराष्ट्र-गांधारी में भी थे, सुभद्रा-अर्जुन में भी, ये हैं बुद्ध-यशोधरा में भी, रह रहे लव कुश में भी| ये जगह नहीं बदला करते, बदलती हैं तो बस तारीखें, लोग, अंदाज़, हिसाब-किताब, और ये बस मजबूरियां| ये ज़िंदा रहते हैं, ये कुछ नहीं कहते बस देखते रहते हैं| हाँ पर इन्हें  चाहिए हूँ मैं, मेरे दोस्त, ज़ाहिर करने को अलफ़ाज़, हाव-भाव से, गुस्सा-मुहब्बत-अफ़सोस| हम चले जाते हैं, समय के साथ, ये ज़िंदा रहते हैं, ये कहाँ कुछ कहते हैं, ये तो बस ज़िंदा रहते हैं| - © अंकुश कुमार 

परमानेंट

कभी चिपकाई थी बिंदी शीशे पे ड्रेसिंग टेबल के| हालात बने ऐसे रहे कि परमानेंट हो गई|  चलते रहे, आहें आती रहीं, इस एक्सीडेंटल प्यार में| मीठी सी गलती यहाँ पूरा वारंट हो गई| पहले कशिश फिर कोशिश बाद बेबाक शरारतें| धीमे से ख़ुशबुऐं यहाँ कोलोन से सेंट हो गईं| उफ़ ये मुस्कुराहटें फिर तरेरना कभी ओंठ काटने| धीमे-धीमे कॉलें यहाँ वेडिंग टेंट हो गईं| कुछ मुलाकातें थोड़े ख़्याल चंद ख़्वाब कैसे रहे| अर्थिंग से ज़िन्दगी आखिर मस्त करंट हो गई| कोई पूछेगा तो आखिर में आप कहोगे क्या? मुस्कुरायेंगे, समझ जाना, यादें परमानेंट हो गईं | - © अंकुश कुमार, इट्स लार्जर देन लाइफ, ग़ज़ल नहीं रे, मुहब्बत!