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उम्मीद भी क्या ज़बरदस्त चीज़ है!

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जब कोई कर बैठता है उम्मीद, तब कुछ ज़्यादा ही आती है शरम, कभी उम्मीदों से कोई रूबरू होकर, कहीं कभी गलती से फोन पर। और शरम ऐसे नहीं आती, की मैं बस शरमा गया... ये आती है मानो कि सारे भरे बाज़ार, पड़े हों लठ्ठ कमर पर। क्योंकि सब इस उम्मीद को किसी का पुरजोर हमला मानो कैसे हो सकता है इस उम्मीद का डटकर सामना बस सोचते रह जाओ और सबसे ज़्यादा आती है तब जब मुझसे बड़े मुझे खुदसे बड़ा समझने लगते हैं। और कर बैठते हैं, बड़ी ही उम्मीदों से उम्मीद। तब ही बदलती है शरम खीझ में, जब आने आने लगता है अनोखा विचार कि तुम क्या क्या हो सकते थे, और क्या क्या कर सकते हो? फिर मिटाने को झेंप अपनी थमा देता हूं उन्हें कॉन्टेक्ट किसी का, जिसे मैं सीधे और व्यक्त शब्दों में कंसंर्न्ड पर्सन परिभाषित हूं करता। मैं जानता हूं जो ये मेरे गिने चुने दोस्त हैं, सब संभाल लेंगे, और अगर नहीं संभाल पाएंगे, तो उनका भी कोई कंसंर्न्ड पर्सन होगा ही। और इस तरह उम्मीदों की रखवाली के लिए बनती जाती है, कंसंर्न्ड लोगों की भौगोलिक और कभी ना खत्म होने वाली लड़ी, जिनमें खुद से उलझे लोग भी, कुछ देर के लिए सही ...

जज़्बात

नज़ीर पूछे जज़्बातों से बोलो तुम क्या कहते हो, जज़्बातों की वकील बानी ज़िबां, बोली ये कहाँ कुछ कहते हैं? ये तो बस ज़िंदा रहते हैं| इन्हें मरना आया ही नहीं, समय के साथ भीष्म मरे, बुद्ध मरे, मरे अनेक शरीर, राम मरे, कृष्ण मरे, रहे जज़्बात अधीर| ये तब भी थे, ये आज भी हैं, ये कल-परसों पे सवार और आगे भी रहेंगे, ये धृतराष्ट्र-गांधारी में भी थे, सुभद्रा-अर्जुन में भी, ये हैं बुद्ध-यशोधरा में भी, रह रहे लव कुश में भी| ये जगह नहीं बदला करते, बदलती हैं तो बस तारीखें, लोग, अंदाज़, हिसाब-किताब, और ये बस मजबूरियां| ये ज़िंदा रहते हैं, ये कुछ नहीं कहते बस देखते रहते हैं| हाँ पर इन्हें  चाहिए हूँ मैं, मेरे दोस्त, ज़ाहिर करने को अलफ़ाज़, हाव-भाव से, गुस्सा-मुहब्बत-अफ़सोस| हम चले जाते हैं, समय के साथ, ये ज़िंदा रहते हैं, ये कहाँ कुछ कहते हैं, ये तो बस ज़िंदा रहते हैं| - © अंकुश कुमार 

परमानेंट

कभी चिपकाई थी बिंदी शीशे पे ड्रेसिंग टेबल के| हालात बने ऐसे रहे कि परमानेंट हो गई|  चलते रहे, आहें आती रहीं, इस एक्सीडेंटल प्यार में| मीठी सी गलती यहाँ पूरा वारंट हो गई| पहले कशिश फिर कोशिश बाद बेबाक शरारतें| धीमे से ख़ुशबुऐं यहाँ कोलोन से सेंट हो गईं| उफ़ ये मुस्कुराहटें फिर तरेरना कभी ओंठ काटने| धीमे-धीमे कॉलें यहाँ वेडिंग टेंट हो गईं| कुछ मुलाकातें थोड़े ख़्याल चंद ख़्वाब कैसे रहे| अर्थिंग से ज़िन्दगी आखिर मस्त करंट हो गई| कोई पूछेगा तो आखिर में आप कहोगे क्या? मुस्कुरायेंगे, समझ जाना, यादें परमानेंट हो गईं | - © अंकुश कुमार, इट्स लार्जर देन लाइफ, ग़ज़ल नहीं रे, मुहब्बत!

अचम्भा

आज एक अचम्भा देखा| वक्त जैसे थमा सा देखा| जितना देखा उतना परखा| चोरों को भी अखरा देखा| बात पुरानी बीत गयी जब| नींद सयानी रूठ गयी तब| जितना जब भी मैंने परखा | अजब गज़ब सा चरखा देखा| आज एक अचम्भा... बीत चुका है सोमवार अब| बार वार की बारी है सब| परखो तुम भी ऐसा परखा| कहना क्या-क्या वखरा देखा| आज एक अचम्भा...

कठघरा

मंदिर किन्हीं ख़ास अभिजात्य वर्ग के लिए तब भी ऐशगाह थे, आज भी हैं और हमेशा रहेंगे और रहेंगे, रहेंगे तब तलक! जब तलक किसी किसी भी मूर्त्ति को वहाँ से जाता नहीं निकाला, किया जाता कठघरे में खड़ा और जाता पूछा, बताओ हर ऐश के हिस्से में तुम्हारा क्या किस्सा है, और इस किस्से के कितने हिस्से में झूमा कौन सा फलक? पर कठघरे में खड़ा किया जाना ज़्यादा  ज़रूरी है|

शुतुरमुर्ग का अंडा

तुम्हारी आँखें जैसे  शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर आँसू ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा तुम्हारा ललाट जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर भी दिमाग ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा तुम्हारा ख्याल जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर फिर सवाल ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... तुम्हारा नक्श जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसीपर हावभाव ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... तुम्हारी खिलखिलाहट जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर मेरी हालत ऐसी-जैसे शुतुरमुर्ग का.... तुम्हारे कुछ ख़यालात जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा फिर मेरे सवालात ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... तुम्हारी गरिमा भी जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा और उसपर फिर इठलाना ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... तेरा आंखें दिखलाना जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा फिर मेरी हरकत बचकाना ऐसी-जैसे शुतुरमुर्ग का... तेरे-मेरे बीच की दीवार जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर मेरे ये हालात ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... मेरे कुछ अरमान जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा उसपर तेरे वादे ऐसे-जैसे शुतुरमुर्ग का... तेरा कहीं खोजाना जैसे शुतुरमुर्ग का अंडा और उसपर तेरा मिल पाना ऐसे-जैसे...|

माहौल आज-कल!

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At your service majesty जंगलों में जिनके आज-अभी  अवशेष रहते हैं|  हक़ीक़त है इतने ही हौसले आखिर में शेष रहते हैं|| अख़बार या दीवार  को जो ख़ास हैं कहते|  अंदर भी उन्हींके कई-कई भेस रहते हैं|| जो हाथ-पैरों को आवाज़ से महफ़ूज़ रख लेते| झोली में उन्हीं की मुकम्मल लोग रहते हैं|| चलन है मीडिया कुछ भी फैला दो दार हो चाहे| आस्तीनों में उन्हीं की कहीं पर सांप रहते हैं || सनातनी की तनातनी  या आर्यसमाज का खाना | गुज़रना मत कभी यहाँ पर नीच रहते हैं || माहौल नफ़रत का तुम भी सहयोग दो थोड़ा| लोगों का काम है लड़ना लो हम हाथ देते हैं || भेस                      =                Compositions/Faces. महफ़ूज़                =                Preserved. मुकम्मल             =             ...