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घृणा! आक्रोश! अश्रु!

ये घृणा का स्पंदन है, ये आक्रोश से वंदन है। इसे बस नमक-आप मत समझना, ये अश्रु रक्त क्रंदन हैं। हम वर्ण से कृष्ण हैं हम काक हैं, तो हममें कुछ कोयलें भी हैं। अज्ञानता के दिन और थे, लेकिन आज हम अभिमानी हैं। ये घृणा का स्पंदन है... ज़हर की तरह बात फ़ैल चुकी है बदन में, आजकल में अण्डे तोड़ने आयेंगी कोयलें। सलाखें गर्म हैं ध्यान रखियेगा बात को, क्या गलत होगा कहना कि पार हो जायेंगी साख में। ये आक्रोश से वंदन है... शतब्दियों से कटी-लटकी गर्दनें, विषसम स्वेदपूरित व्यभिचार। समस्त घिनौने अत्यापापाचार, हैं हमारी नाक पे बेखटके-अटके। इसे बस नमक-आप मत समझना, ये अश्रु रक्त क्रंदन हैं... गर आप सोचते हैं, सब माफ़ हो चुके हैं। तो कह भी दीजिये विश्वगुरु के पास नया बहाना है, आखिर हर किसी को एक दिन आना जाना है। नहीं है जवाब कोई तो कोई शिकवा नहीं, पर अब ये भी याद रख लीजियेगा! आशिकी, हलाली और रुदाली गई तेल लेने। आगे आग का दरिया है, एक-एक को डूब के जाना है। ये घृणा का स्पंदन है, ये आक्रोश से वंदन है... इसे बस नमक-आप मत समझना, ये अश्रु रक्त क्रंदन हैं... ...

तुम क्या चाहते हो

वो क्या है जो सिर में ज़हर सा बैठ गया है, और गले का सहारा लेकर बाहर आना चाहता है, और फ़िर खुद मेरे धड़ को कुचलने-निगलने लगा है, मैं शिथिल हो रहा हूँ। भावुक भी हूँ। सोच रहा हूँ उगलूँ या निगलूँ? निगलूँ तो नहीं रहूंगा। और उगलूँ तो मैं, मैं नहीं रहूंगा । क्या यही जीवन यंत्र - मंत्र - तंत्र का अंतिम संगीत है। अत्यंत भद्दा और बेसुरा। किनसे पैदा हुआ है? या स्वयं उत्पत्ति का केंद्र है? अरे! पहचाना तुम्हें, तुम वही हो ना जो मिर्च खाकर भी हंसते हो। अरे! तुम वहीं से हो ना जहाँ अक्ल-मंद लोग बसते हैं। अरे! तकियाह तो उतारो ज़रा हम भी तो देखें ऊपर से गंजे हो। अरे! ऐसे काम करते ही क्यूँ हो जिसपर सारे राज्य तुमपर हँसते हैं। कुटिल, निष्ठुर, कुरूप किन्तु हास्यास्पद... पूर्वाग्रह! पूर्वाग्रह! ओह पूर्वाग्रह! क्या इलाज करें तुम्हारा या तुम लाइलाज हो? सवाल क्यूँ करा जाये तुमसे जब तुम खुद जवाब हो। तुम छोड़ते हो मुझे खुद या मेरा आक्रोश तुम्हें पी ले॥ नियती नहीं हो तुम, मेरा अज्ञान हो! अंधकार हो! तुम्हारे खिलाफ़ है मेरा अब... सत्याग्रह! सत्याग्...

यही धोखा है

उनकी आँखें सवेरा थी किसी का। टूटी इमारतें बसेरा थीं किसी का॥ परछाइयों के पीछे छिप गयी हैं वो। जो कभी आँखें पहरा थीं किसी का॥ वक्त को थामकर जाना था जिन्हें आगे। काल के गाल में चेहरा छुपा है उन्हीं का॥ गलती का मतला ही पता ना था जिनको। हार का कहर अब उन्हें पता है कभी का॥ दरम्याँ ही चलना जो समझते थे मुनासिब। खाक और राख में वक्त ठहरा उन्हीं का॥ आलीशान थे जिनके कभी महलों के ख्वाब। अब कहाँ वो मज़ार नाम तो लो सरज़मीं का॥ कुदरत के बंदे हो फ़ितरत से मिल लेना। नज़ीर ख्वाबों का क्या चांद ठहरा किसी का॥

खिलाफ़त भी ज़रूरी है

कहीं कभी इज़हार से पहले इश्क़ हो ना जाये। कहीं कभी इकरार ये अहले मुश्क खो न जाये॥ हाथों को अपने थाम लेंगे जेबों से, पर डर है। कहीं ये कब्ज़े रियायत में जाम हो ना जायें॥ ये शबनमी नरगिस  में बयार का असर देखो। ये उड़ता हुआ तीर, दिल के आर-पार हो ना जाये॥ मानो तराश रहे हों कलम से तुझको कारीगर लाख। तुझमें जान फ़ूँककर आशिक़गर लाश हो ना जायें॥ बाँध ली हैं जो तूने तितलियाँ करम पर। यहाँ कुदरत में खुदगर्ज़!  बग़ावत हो ना जाये॥ अल्फ़ाज़ होंगे ताक पर, कसूर ज़िबा का होगा। दीद से बातों में ही कहीं इश्क़ हो ना जाये॥ पर कभी इबादत तो कभी खिलाफ़त । के बहाने मुलाक़ात हो जो जाये॥

उधड़ी मानसिकता

घर में चल रही कम्बल चर्चा पर , बच्चे ने पूछा अमुक अंकल , आपका क्या मंतव्य हो सकता है! बलात्कारी के बलात्करण पर , और बलात्कृत के बलात्कार पर । थोड़ा खोले और अधमुंदी आँखों से बोले , बेटा अभी क्यूँ है ये ज़रूरी , जो बात हो सके ना पूरी... घर में चल रही कम्बल चर्चा पर... इक घुप्पी के बाद बच्चे ने पूछा फ़िर से वैचारिक समन्वय पर दृष्टि पाने हेतु , क्यूँ ज़रूरी है अंधेरा साँकल के सुस्ताने  को ? क्यूँ पड़ी हैं कच्ची बेड़ियाँ सूरज के माथे को ? क्यूँ गलती पे होता है छिपना पीछे पछताने को ? बताइये ना कहाँ छोड़ते कहाँ जकड़ते ये काले मटियाले सेतु ? आपका क्या मंतव्य हो सकता है... मानो नमक मली हुई हथेलियाँ किसी ने आँखों पे रगड़ी हों , माननीय की साँस सी उखड़ी मानो नस कसकर पकड़ी हो। बच्चे ने पूछा  अमुक  अंकल... पहली बार अंधेरा इस घर से सन्नाटा ला रहा था। वरना चुप्पी का बाल भी बाँका ये घर कर पा रहा था! घर में चल रही कम्बल चर्चा पर... इस मौन में सब कुछ पसरा था , संवेदनायें ...

हर दर्द का ज़मींदोज़ होना

ज़मींदोज़ हुई ज़मीं,        ज़मीं पर बने खेत,               खेतों पर बहती नदी,                      आब पर बसा वायुदाब। और सब पर मनुष्य का प्रताप। आग हवा जल जंगल ज़मीं। सब एक के ऊपर एक, और सब पर आदमी। सभी पर सभ्यता की लकीरें खींची सभी मिटीं। ना बची सभ्यता ना बचा आदमी । बचा या बचा क्या सवाल होगा, किसका बचाव होगा? गर कुछ बचा तो बस, आग हवा जल जंगल ज़मीं। ज़मींदोज़ हुई ज़मीं,        ज़मीं पर बने खेत,               खेतों पर बहती नदी,                      आब पर बसा वायुदाब।

यमप्रश्न समुपस्थित है

हे नचिकेतः! तुम भी अनभिज्ञ नहीं हो अपनी, ख्याति से थाती से। सबकी नज़रों में तुम सर्वज्ञ थे। ज्ञानार्जन को निर्लज्ज थे। इन सब के बावजूद! आज यम प्रश्न उपस्थित हुआ है। तुम क्या कहते हो नचिकेता!             तुम्हारा जीवन क्या है? क्या तुम्हें खुद से नफ़रत नहीं है? जब तुम गये यम के पास, ज्ञान पिपासु होकर। बस बैठे रहे, पिपासित होकर। तब तुमने क्या सीखा? उन तीन दिन तीन रातों में, अगर तुम इतने ही सुशील, आज्ञान्वित छात्र थे, तो बताओ क्या बीता? निश्चय ही तुम बताना नहीं चाहते हो। क्यूँकि तुम स्वयम् से डरते थे! डरते हो! जब विचारक तुम स्वयम् से घबराते हो! तो रश्मिरथि कैसे हो सकते हो? तुम्हें आत्मा नहीं राजनीति पर ध्यान देना चाहिये। अपने पिता से कहो, बस! बहुत हुआ! अब तुम्हें आराम करना चाहिये। तुम मानते हो, तुम! आज्ञास्थिर हो। धैर्यवान हो। मैं मानता हूँ! नचिकेत केनाज्वा यज्ञाग्नि, तुम बहुरूपिये हो। जो वैकासीय बातों के द्योतक ना होकर, आकाशीय बातों के द्योतक...