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साये में

तुम रेत के वीरान दरम्याँ निकली नदी सी हो। इसराफ़ १   खुर्द २ ख्वाहिशों पे तक़रीबन नबी ३ सी हो।। वक्त को भी सब खबर है , वक्त का ही तो असर है। सज़दे में तिरे सिर झुकाये हमको तेरी किस कदर है। नाज़िम ४ बन बैठे है दुश्मन ,  नाज़िर ५ बने हुये हैं दोस्त। खुसफ़ुसाते हैं कान में , जो तबियत ज़रा वहमी सी हो।। तेरे कंधे , तेरी गर्दन पे अड़े वो खुदरे ६ खुरदुराते निशान। साझा सवाल हैं , जाहिर   जवाब ,  हैं   या खुद खालिस बयान। गर नज़र होती आज भी तो बहल जाता मेरा मन। पर बारिशों से पूछुँ अब , क्या मेरी गलतफ़हमी सी हो॥ कशसफ़े ७   पे   तुझे याद रखना   मेरी आदत बन चुकी। अब तबियत मेरी तबियत तेरी , ताउम्र आई ढल चुकी। हर्फ़ ८ , किस्सों में बदलने चला खुदको कुछ यूँ आज अब। तीरगी ९   के अक्स मानो तुम खुद खुशफ़हमी सी हो।। तुम रेत के वीरान दरम्याँ निकली नदी सी हो। इसराफ़   खुर्द ख्वाहिशों...

बस आजकल!

कई धड़ों में बंटा है कवि आजकल! कुछ का राम कुछ का रावण तो कुछ शंबूक खासकर! सभी की अपनी उम्मीदें और सब के खास शिकार और व्यापार। कहीं बिछे पुल तारीफ़ों के कहीं आगज़नी, दुत्कार, धिक्कार, तिरस्कार। राम आये सुख-दुःख बांटने। रावण भी आये सुख का आश्वासन देने। दोनों में अब कुछ खास विरोधाभास नहीं है। तब से नाहक का बंटवारे और आश्वासन पर, विश्वास नहीं है। क्यूँकि राम के पास सुख का बंटवारा नहीं है। और रावण के पास देने को बस उम्मीद है। यहाँ घोर काल में इसीलिए नाहक खास मुरीद हैं। कई धड़ों में बंटा है कवि आजकल। क्यूँकि मुंह तो किसी के पास, है ही नहीं आजकल! : © "Ankush Arya", 2017

बस इक याद ही तो है

उन बंद गुम कमरों को बताना उनकी नींव पक्की थी, उन ताकतवर दरवाज़ों से कहना उनकी तबियत अच्छी थी, उस डगमगायी ड्योढ़ी को छेड़ना उनकी नीयत तरक्की थी, उन खुरदुरी सीढ़ियों पर भी बैठकर फ़िर फूलों पे नज़र करना और उन खुश्क गुलों से कहना उनकी खुश्बू सच्ची थी| याद क्यूँ नहीं होंगे आज भी वो अभी कल ही की तो बात है, तुम हो, मैं हूँ, सब हैं, ये जो सोच-दिन हैं और यादरात हैं। वो जो नदी बहती थी याद होगी तुम्हें? ना वो कल-कल बहती थी ना ढुल-ढुल लुढ़कती| उसकी अंदाज़-ए-रवानगी ही कुछ और थी याद होगी तुम्हें? उसका भी बयान रुकता था हर साल जेठ दुपहरी में, हर सूखते गले की अठखेलियाँ तो याद होंगी तुम्हें? पर फिर उन सभी यादों के आंगन, क्यारी, नावों पर खास अपना नाम उकेरना मत भूलना; और ये याद करना तुम कितने ज़रूरी हो! : © "Ankush Arya", 2017

दंश का अंश

हवा में घुटी दबदबाती सी चीख को ,           उन तमाम दरख्तों पर उतारा। फ़िर लिखा मुझे चाहिये गालियाँ औ’           मुझे और तुम्हें बस इसी का सहारा॥ हुजूम नहीं लगा लिखने वालों का, इक्का-दुक्के आते थे, हवा में हाथ, हाथों में हवा, जादू की तरह फ़हराते थे| हवा में घुटी दबदबाती सी चीख को... सर्पंच ने अब गुप्तचर बांध लिये दुश्मन से बचने को, किसी को भी नहीं पता अब कौन-कौन है? सबका शक ही इक दूसरे पे क्यूँकि तहक़ीकात मौन है, फ़िर भी शाम को मुँह-अंधेरे की बात से चबूतरों पे, हुक्क़ों के साथ-साथ खाँसियों का हुजूम है, कुछ नई खाँसियाँ हैं, कुछ पुरानी तो कुछ मौत को आने वाली हैं, बाकी बचे तितर-बितर गुड़गुड़-खाँसी सुनने आ गये। फ़िर लिखा मुझे चाहिये गालियाँ औ’... हर हुक्के पे ढेरों फीक़ी हँसियाँ उकेरे,           सभी के फीक़ेपन को है इंतज़ार। कोई समधी कुछ तो कहे कुछ तरेरे,           कहाँ हैं नक्शेक...

जनता का बड़ा मन था!

कुछ किया है ऐसा, मानो सपनों को आंखों में, हो धकेल दिया। कुछ जिया ऐसा, मानो बाल से नाक में, हो नकेल दिया। छींक भी आई तो फूं फूं कर दिया, आंखों से निकला पानी वापस गटक लिया। हाथों में तीर था फिर खुद चुभो लिया, पर कहे उड़ रहा था, तो हमने ले लिया। बारात में जाने को कभी मचला था हिय, तो नए कपड़ों पर हमने, ये पैबंद दे दिया। जाना है जब आगे कुछ कहना जरुर होगा, लो आसमां​ को थूका और ऊपर ले लिया। जब बगावती होगे तो नीम दंश रखना, तुम गाली कहां दोगे,जब खुखरी था रख लिया। इस कत्ल-ए-आम का कोई काश नाम होता, आवाम के जो तुमने, था ख्वाबों पे रख दिया। : © "Ankush Arya", 2017

उसूल है तो संदूक है

ये बेनज़ीर*-बेवजह, तुम नज़रों को उठाये।         अनकही-कहीं ताके-बताके जाये जा रहे हो।। उन तारों को, ना दूरबीन ना दूरंदीद के।         बेहया-बेहिचक लगार * -वार सताये जा रहे हो।। गाँव की ज़मीनों पे, ना रखो करम-नज़रें।         सियासी ज़मीन पे आस अड़ाये जा रहे हो।। ये सर्रर्रर्र सी आवाज़, मदहोशी का आलम।         *ब ताशों पे क्यूँ नज़रबाज़ गड़ाये जा रहे हो।। कुछ खास हो  गर तो  पैबस्त* कर लो नफ़्स* में।         क्यूँ रेज़े-रेज़े* पे हाईलाईटर घुमाये जा रहे हो।। इन बेरौनक हवाओं में, पैरहन* से दुश्मनी।         फ़िर क्यूँ सर्दी में शिकायत जमाये जा रहे हो ।। *बेनज़ीर- बिना किसी नज़रिये के, *लगार- क्रम, सिलसिला *ब- कुशलतापूर्वक, *पैबस्त- कसकर समेट लेना, *नफ़्स- आत्मा, *रेज़े- (बहुवचन) रेज़ा, छोटी से छोटी चीज़, *पैरहन- पहना जाने वाला लंबा सा कोट। : © "Ankush Arya", 2017

क्षुधा से क्षुब्ध

आहार की तलाश वा शिकार भात मनुष्य अथवा सभी जानवरों के लिये, क्या सामुदयिकता का समारोह है? या यह वह प्रसाद है, जिसे वह सप्रेम अधिकार ग्रहण करता है। यापन रूपी जीवन के लिये,             वा जीवन स्थित यापन के लिये? निश्चय ही सप्रेम संधि है             जिसमें आवरण उच्छेद भी उतना आवश्यक है जितना             परिच्छेद कथा के लिये। मानव ऐन्द्रिय रूप से सामुदायिक है, या इन्द्रियों के लिये सामुदायिक है? ये अनिवार्य क्षुब्ध प्रश्न है क्षुधा से! आहार के लिये विचार के  लिये। : © "Ankush Arya", 2017