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जज़्बात

नज़ीर पूछे जज़्बातों से बोलो तुम क्या कहते हो, जज़्बातों की वकील बानी ज़िबां, बोली ये कहाँ कुछ कहते हैं? ये तो बस ज़िंदा रहते हैं| इन्हें मरना आया ही नहीं, समय के साथ भीष्म मरे, बुद्ध मरे, मरे अनेक शरीर, राम मरे, कृष्ण मरे, रहे जज़्बात अधीर| ये तब भी थे, ये आज भी हैं, ये कल-परसों पे सवार और आगे भी रहेंगे, ये धृतराष्ट्र-गांधारी में भी थे, सुभद्रा-अर्जुन में भी, ये हैं बुद्ध-यशोधरा में भी, रह रहे लव कुश में भी| ये जगह नहीं बदला करते, बदलती हैं तो बस तारीखें, लोग, अंदाज़, हिसाब-किताब, और ये बस मजबूरियां| ये ज़िंदा रहते हैं, ये कुछ नहीं कहते बस देखते रहते हैं| हाँ पर इन्हें  चाहिए हूँ मैं, मेरे दोस्त, ज़ाहिर करने को अलफ़ाज़, हाव-भाव से, गुस्सा-मुहब्बत-अफ़सोस| हम चले जाते हैं, समय के साथ, ये ज़िंदा रहते हैं, ये कहाँ कुछ कहते हैं, ये तो बस ज़िंदा रहते हैं| - © अंकुश कुमार 

जो भी समझो!

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ऐसा मैं क्या लिख दूँ अब! इक सम्यक सा झूठ लिखूँ या कहूँ तिलमिलाया सच, अपनी तीखी जुबां घोल दूँ या पीलूँ मैं अब आहें सब, तेरी तारीफों पे तारीफें कर दूँ या करुँ मन खुरदुरा अब, तेरा सवाल मेरा जवाब या मेरे सवाल तेरे जवाब, तरन्नुम पे हालात लिख दूँ या ज़हर भरे से कड़वे शब्द, बेगानी बातें सब लिख दूँ या लिख दूँ दिल की हालत अब! मेरा कहा अपना अनकहा जो भी तूने झेला होगा! तेरा भी कुछ बयान होगा जो कुछ तूने ठेला होगा! मैंने तुझसे तूने मुझसे जो कुछ थोड़ा खेला होगा! ख़ास खराबी होंगी मुझमें पर थोड़ी-थोड़ी सबमें  होंगी, कहना जो कुछ होगी शिकवा जिनसे भी मन दहला होगा! तेरी आँखें  पत्थर हो जब नाम कुरेदना मेरा तब| नहीं मिटेगा अमिट रहेगा मेहंदी-रोली टीका रब| हाथ सभी हों जब गज-बज घर-भर को सजाना तब| अमर रहेंगे अजर कहेंगे शीशा-तुलसी दर पे सब| ऐसा मैं क्या लिख दूँ  अब! सम्यक                       =                        ...

यमप्रश्न समुपस्थित है

हे नचिकेतः! तुम भी अनभिज्ञ नहीं हो अपनी, ख्याति से थाती से। सबकी नज़रों में तुम सर्वज्ञ थे। ज्ञानार्जन को निर्लज्ज थे। इन सब के बावजूद! आज यम प्रश्न उपस्थित हुआ है। तुम क्या कहते हो नचिकेता!             तुम्हारा जीवन क्या है? क्या तुम्हें खुद से नफ़रत नहीं है? जब तुम गये यम के पास, ज्ञान पिपासु होकर। बस बैठे रहे, पिपासित होकर। तब तुमने क्या सीखा? उन तीन दिन तीन रातों में, अगर तुम इतने ही सुशील, आज्ञान्वित छात्र थे, तो बताओ क्या बीता? निश्चय ही तुम बताना नहीं चाहते हो। क्यूँकि तुम स्वयम् से डरते थे! डरते हो! जब विचारक तुम स्वयम् से घबराते हो! तो रश्मिरथि कैसे हो सकते हो? तुम्हें आत्मा नहीं राजनीति पर ध्यान देना चाहिये। अपने पिता से कहो, बस! बहुत हुआ! अब तुम्हें आराम करना चाहिये। तुम मानते हो, तुम! आज्ञास्थिर हो। धैर्यवान हो। मैं मानता हूँ! नचिकेत केनाज्वा यज्ञाग्नि, तुम बहुरूपिये हो। जो वैकासीय बातों के द्योतक ना होकर, आकाशीय बातों के द्योतक...