जज़्बात
नज़ीर पूछे जज़्बातों से बोलो तुम क्या कहते हो, जज़्बातों की वकील बानी ज़िबां, बोली ये कहाँ कुछ कहते हैं? ये तो बस ज़िंदा रहते हैं| इन्हें मरना आया ही नहीं, समय के साथ भीष्म मरे, बुद्ध मरे, मरे अनेक शरीर, राम मरे, कृष्ण मरे, रहे जज़्बात अधीर| ये तब भी थे, ये आज भी हैं, ये कल-परसों पे सवार और आगे भी रहेंगे, ये धृतराष्ट्र-गांधारी में भी थे, सुभद्रा-अर्जुन में भी, ये हैं बुद्ध-यशोधरा में भी, रह रहे लव कुश में भी| ये जगह नहीं बदला करते, बदलती हैं तो बस तारीखें, लोग, अंदाज़, हिसाब-किताब, और ये बस मजबूरियां| ये ज़िंदा रहते हैं, ये कुछ नहीं कहते बस देखते रहते हैं| हाँ पर इन्हें चाहिए हूँ मैं, मेरे दोस्त, ज़ाहिर करने को अलफ़ाज़, हाव-भाव से, गुस्सा-मुहब्बत-अफ़सोस| हम चले जाते हैं, समय के साथ, ये ज़िंदा रहते हैं, ये कहाँ कुछ कहते हैं, ये तो बस ज़िंदा रहते हैं| - © अंकुश कुमार